26 नवंबर 2014

मैं और वह

------------------कविता-श्रृंखला
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मैं पूरब से आया और वह पश्चिम से..फिर हम दोनों एक बाज़ार में पहुंचे
मैंने घोड़े की नाल खरीदी और उसने घोड़े के पंख
यह युद्ध का समय नहीं : मैंने उससे कहा
यह शांति का भी समय नहीं : उसने प्रतिवाद किया
घोड़ा कहां मिलेगा : तब मैंने पूछा
जहां प्रेम मिलेगा : तब उसने कहा
क्या यह प्रेम का समय है : मैंने उसकी आंखों के काजल का अर्थ समझते हुए पूछा
हां, यह प्रेम का समय है : उसने अपनी आंखों के काजल का अर्थ समझाते हुए कहा
हम समुद्र के बहुत नज़दीक थे और घोड़े के हिनहिनाने की आवाज़
बहुत साफ सुनायी दे रही थी
मैंने देखा उसके सफेद स्कार्फ में पीछे छूटते हुए बाज़ार के रंग
किसी प्रिज़्म की मानिंद चमक रहे थे
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[दिलीप शाक्य ]

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