13 अप्रैल 2014

ग़ज़ल

उधर है जान-ए-तमन्ना इधर ज़माना है
उधर भी जाना है मुझको इधर भी आना है

है उसकी चश्म का जादू कि दिल गुलाबी है
कड़ी कमान का इक तीर ग़ालिबाना है

मिले किसी को जो चाबी तो इस तरफ़ आए
हमारी नींद में ख़्वाबों का इक ख़ज़ाना है

मैं तेज़ धूप में हूं प्यास का बदन लेकर
वो आबशार है उसको मुझे बुझाना है

नयी उमीदों के तैयार हो रहे हैं लिबास
वफ़ा के शहर में यादों का कारख़ाना है

मैं चारागर तो नहीं फिर भी नब्ज़ देखूंगा
मेरे भी लम्स की बीमार को तमन्ना है

न अजनबी कोई तुमसा न मुझसा आशिक है
न तुमने जाना है मुझको, न मैंने माना है

इस इब्तिदा की कोई इन्तहा नहीं होनी
ये दरमियान का मारा कोई फ़साना है

है उसका नाम सियासत मेरा है शौक़-ए-जुनूं
शहर का काम तो दोनों को आजमाना है

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दिलीप शाक्य


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