25 अप्रैल 2014

नए ज़माने की वार्ता-1/दिलीप शाक्य

[क़िस्सा एक स्कूटी-राइड का]

बरसों बाद एक लड़का जब अपने शहर लौटा तो उसने उस लड़की से मिलने के बारे में सोचा जिसके बारे में अब यह सोचना एक फ़िज़ूल ख़याल था कि वह कभी उसे प्रेम करता था। लड़के की तरह लड़की भी एक सुखी संपन्न गृहस्थ जीवन जी रही थी। लड़का कार से आया था फिर भी उसने उस बस का टिकिट लिया जो लड़की के घर से ठीक एक किलोमीटर पहले रुकती थी। लड़का शायद उस पुरानी स्मृति के रोमान को फिर जीना चाहता था।

दोपहर बाद का आसमान हल्के भूरे बादलों से झांक रहा था। लड़के को लगा कि वह बरसों पहले की उसी दोपहर के छायाचित्र में चला आया है जो कभी किसी शाम में ढलने को तैयार नहीं हुई। एक किलोमीटर का फ़ासला तय करते हुए लड़का उस मंदिर के बारे में सोचने लगा जिसकी एक दीवार के पीछे उसने लड़की के सम्मुख अपने प्रेम का झिझक भरा प्रस्ताव रखा था। जैसी कि प्रथा थी पुरानी फ़िल्मों की नायिकाओं की तरह लड़की ने लड़के से कहा कि पहले कोई मुक़ाम हासिल करो फिर सोचेंगे। लड़का तब लड़का था जबकि लड़की बड़ी हो चुकी थी। लड़के को बड़ा होना मंज़ूर नहीं था। लिहाजा कई बरसों तक उनकी मुलाक़ात नहीं हुई। अब जब घड़ी के कांटे कई हज़ार चक्कर लगा चुके थे, लड़के ने फिर अपने बड़े होने को झुठलाना चाहा।

लड़का अपनी स्मृति को खुरच ही रहा था कि हल्के ट्रैफ़िक के शोर से निकलकर एक पुरानी सफ़ेद स्कूटी नज़दीक आकर रुकी- हैलो मिस्टर, पहचाना? लड़के के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वही लड़की सामने थी। धूप का काला चश्मा हटाते ही सांचे में ढली उसकी आंखें मुस्कुराने लगीं - इधर किधर?

‘‘आज भी वही स्कूटी?’’ लड़के ने पूछा।

’आपको कोई एतराज़ है?’ लड़की ने जवाब दिया।

‘नहीं!....लिफ्ट मिलेगी? ’

या स्योर, बोलो कहां ड्रॉप करना है?

‘पहले किसी रेस्टोरेंट में कॉफी, फिर बस स्टॉप।’

‘आज भी बस स्टॉप? लड़की ने पूछा।

‘आपको कोई एतराज़ है? लड़के ने जवाब दिया।

‘नहीं!....बैठो। लड़की ने कहा।

‘लेट मी ड्राइव’। लड़के में छिपे पुरुष ने अपनी जगह बनाते हुए पूछा।

‘नो वे, मत भूलो कि स्कूटी हमारी है। तो ड्राइव भी हम ही करेंगे। तुम पीछे बैठो। लड़की अभी भी लड़की ही थी। स्त्री होने के आत्मविश्वास से भरी।

लड़की ने स्कूटी स्टार्ट की, लेकिन लड़का अभी भी खड़ा था।

बैठो!

कैसे ? पुराने स्टाइल में?

हा हा... काफ़ी समझदार हो गये हो!...सिट क्रॉस लैग। सख़्त लहजे में लड़की ने कहा। लड़के ने वैसा ही किया। फिर रेस्टोरेंट में कॉफी पीते हुए दोनों उस पुरानी स्मृति पर बहुत देर तक हंसते रहे। लड़की बताती रही कि पिछली बार लड़का कैसे क़स्बाई महिलाओं की तरह विदाउट क्रॉस-लैग बैठा था और फिर लड़की ने कहा था-सिट क्रॉस-लैग। लड़की ने याद किया कि वह कैसा दब्बू सा दिख रहा था जब उसे स्कूटी ड्राइव करती एक लड़की के पीछे बैठना पड़ा था। ‘एण्ड यू वर लुकिंग लाइक रानी झांसी सिटिंग ऑन हॉर्स। लड़के ने शरारत के लहजे में ही सही, एक गंभीर बात कह दी थी, जो लड़की को अच्छी लगी।

कॉफ़ी ख़त्म हुयी। लड़की ने फिर स्कूटी स्टार्ट की। लड़का फिर पीछे बैठा। एक किलोमीटर की स्कूटी राइड में ब्रेक का वक़्त था। लड़की ने उसी मंदिर के सामने ब्रेक लगाया जिसके बारे सोचते हुए लड़के की स्मृति में स्कूटी राइड का दृश्य उभरा था।

‘‘यहां क्यों? क्या फिर से प्रपोज़ करना होगा?’’ लड़के ने थोड़ा रूमानी होते हुए पूछा।

‘‘नहीं मिस्टर! तुम्हें यह दिखाने के लिए कि पिछली बार जिसे मंदिर समझ के देखा था, देखो आज वह कैसा मक़बरे सा लगता है।’’
लड़की ने थोड़ी झुंझलाहट में स्कूटी स्टार्ट की और लड़के को उसी बस-स्टॉप पर ड्रॉप किया, जहां से दोनों के रास्ते हमेशा हमेशा के लिए अलग हो गये थे। लड़का चलते-चलते लड़की की पलकों में देखना चाहता था कि वहां किसी पहाड़ी दरख़्त की छांव है या किसी रेगिस्तानी नदी की धूप, लेकिन लड़की ने चलते-चलते भी अपनी आंखों से धूप का चश्मा नहीं हटाया।
[नोट: इस वार्ता के सभी विवरण काल्पनिक हैं, फिर भी वार्ताकार का आग्रह है कि उन्हें सत्य समझकर पढ़ा जाए। वार्ता के संबंध में किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर के लिए टिप्पणीकार स्वतंत्र हैं। आशा है वृत्तांत-लेखन की यह शैली आपको पसंद आएगी। अपने विचार साझा करें। आगे विविध विषयों पर अनेक वार्ताएं आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं-वार्ताकार। ]

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