22 मार्च 2014

पानी की परछाईं

पानी नहीं था
पानी की परछाईं थी महज़

मैंने ख़ूब ख़ूब
बहुत ख़ूब टटोलकर देखा
प्यास के जिस्म में जान नहीं थी

प्यास की परछाईं थी महज़
जो पानी की परछाईं के
घुटनों पर झुकी थी

धरती के सीने से
रिस-रिस कर फूट रहा था
आंसुओं का एक नमकीन सोता
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दिलीप शाक्य


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