19 फ़रवरी 2012

फिर उसे हमने किसी आँख में ठहरा देखा

उसके हाथों में कोई फूल सा चेहरा देखा
फिर उसे हमने किसी आँख में ठहरा देखा

दिन फिरा धुंध की चादर  को लपेटे दिन भर
रात की बाँहों में सिमटा हुआ कोहरा देखा

रात भर चाँद जला साज़ बजा रक्स हुआ
ता सहर बज़्म ने आकाश सुनहरा देखा

दिन उगा, फूल खिले, शहर में सब्ज़ा हर सू
उसने हर रंग में एक रंग सा गहरा देखा

हर तरफ आज वही देख रहा है दरिया
उसने कल इश्क़ में तपता हुआ सहरा देखा

                                -(दिलीप शाक्य)

12 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. shukriya rishabh ji...sachmuch, aapke sath ncert ke wo din bade lajawab guzre..umeed hai ki fir milenge.....

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  2. उसके हाथों में कोई फूल सा चेहरा देखा
    फिर उसे हमने किसी आँख में ठहरा देखा


    Bahut Umda.... Behtreen Panktiyan

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  3. ye ghazal achchhi hai. iska dusra she'r to lajawab hai.. Congrts!!!!!!!!!

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  4. समर्थ सारस्वत29 फ़रवरी 2012 को 5:16 pm

    बहुत बढिया सर... बधाई ..

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