17 मई 2011

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग






‘‘हमने जो तर्ज़े-फुगां की थी क़फस में ईज़ाद
          फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयां ठहरी है’’



गर्मियों की एक ढलती हुई दोपहर है। हल्की पीली धूप में गेंहू की पकी हुयी फसल का रंग सोने सा दमक रहा है। कुंए पर घूम रहे रहट के पानी में सूरज की किरणें चमक रही हैं। बैलों के गले में बंधी घंटियां बीच बीच में बज उठती हैं। नीम के घने दरख्तों की  शाखों से रह रह कर एक कोयल की पुकार उठ रही है। फ़ज़ा में कहीं से मेहदी की ख़ुश्बू उड़ रही है। एक अफसुर्दा सी शाम ख़ुलने के क़रीब है और एक बेरी के झाड़ की छाया में मरफी कंपनी के एक पुराने ट्रांजिस्टर से निकलकर सुरों की मलिका नूरजहां की आवाज़ का दर्द हवा में मदहोश होकर बिख़र रहा है। 

‘‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग
मैने समझा था कि तू है तो दरख्शां  है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
  तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है''

यह है फैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी से मेरी पहली मुलाक़ात की धुंधली सी याद। लेकिन यह तब की बात है जब न फैज़ का नाम सुना था न नूरजहां का और न ही नज़्म को सुनने और समझने का ठीक ठीक सलीका था। मैं चंबल की घाटियों में बसे एक दूरस्थ क़स्बे के सामान्य से स्कूल का विद्यार्थी था। लेकिन दिल साइंस की किताबों के बनिस्बत कर्नल रंजीत के जासूसी नॉविलों और ट्रांजिस्टर पर बजने वाले सुरीले संगीत में  अधिक धड़कता था। बाद में यह सिलसिला उसी तरह छूट गया जैसे लड़कपन का कोई इश्क़ या किसी पुरानी क़मीज़ का रंग।
आगे कॉलेज की पढ़ायी के दौरान, 1975 में हिंद पॉकेट बुक्स से  छपी एक पीली सी किताब हाथ लगी ‘उर्दू की बेहतरीन शायरी’। संपादक थे प्रकाश पंडित। इस किताब से पहली बार पता चला कि लड़कपन में ट्रांजिस्टर पर जो नज़्म सुनी थी, वह किसी फैज़ अहमद फैज़ नाम के शायर की थी जो 1911 में पाकिस्तान के सियालकोट में पैदा हुआ था। उस पुरानी याद के लिहाज में फै़ज़ की इस शाहकार नज़्म को कुछ कच्ची पक्की समझ के साथ ध्यान से पढ़ा। तब यही समझा था कि यह एक एक ऐसे आशिक के बारे में है जो अपने मेहबूब के साथ यह कहकर चला होगा कि ‘तेरी आखों  के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है’ लेकिन बाद में ज़माने से उलझा तो उसे समझ आया कि ‘और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा। राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ लिहाजा ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’। बहुत लॉजिकल मांग थी। लेकिन उस वक़्त  हमारे मतलब की नहीं थी। अतः अपनी उमर के दूसरे नौजवानों की तरह हम भी जगजीत सिंह, पंकज उधास और गुलाम अली के नाम से ऑडियो  कैसेटों की दुकान पर बिकने वाले शायरों के इश्क़िया ख़यालों में मसरूफ हो गए।
फिर वह हादसा पेश आया जिसकी वजह से फैज़ की शायरी से हुयी यह छोटी सी मुलाक़ात एक संगीन रोमांस में बदल गयी। हुआ यूं कि एक दोस्त को नया नया इश्क़ हुआ। तो उस दर्द की ख़ुशी में उसने बसंत के दिनों की एक दोपहर हमें एक रेस्तरां में दावत दी। वहॉं एक ऐसे व्यक्ति से मिलना हुआ जो किसी वामपंथी संगठन की क्षेत्रीय इकाई के सक्रिय सदस्य थे और प्रगतिशील विचारों की एक छोटी सी पत्रिका भी निकालते थे। उन्होंने बेहद बेतकल्लुफ अंदाज़ में अगले ही दिन होने वाली अपनी एक बैठक में आने का न्योता दे डाला। वहीं पहली बार ‘कॉमरेड’ और ‘लाल सलाम’ जैसे शब्द सुने। और फैज़ का वह तराना भी ...

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
एक खेत नहीं एक बाग नहीं हम सारा आलम मांगेंगे

जब उस वामपंथी मित्र से पूछा कि यह ख़ूबसूरत तराना किसने लिखा है तो जवाब आया- फ़ैज़ अहमद फ़ै़ज़। मैंने कहा- वही जिन्होंने ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ लिखा है। वह चैंके। बोले ‘तुमने पढ़ा है फैज़ को’। मैंने कहा ‘बस यही एक नज़्म’। उन्होंने तुरंत अपने झोले से एक किताब निकालकर मेरे हाथों में रख दी। वह किताब थी अब्दुल बिस्मिल्लाह द्वारा संपादित फ़ैज़ की शायरी का हिंदी संकलन ‘सारे सुख़न हमारे’। फिर उन्होंने वहीं एक नुक्कड़ पर दो मेहनतकश हाथों की बनी एक चाय पेश करते हुए ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ पर लंबा तब्सरा कर डाला। वहां मेरे समक्ष पहली बार इस नज़्म में छिपे असली मानी प्रकट हुये। इसका पसमंज़र और इसमें छिपे नयी रौशनी के सुरागों की झलक मिली। नज़्म की ये सतरें दिल में जैसे अटक सी गयीं

अनगिनत सदियों की तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा बजा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

इस तरह फ़ैज़ की शायरी के साथ मेरा रोमांस शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद नौजवानी के इश्क़ में चोट खाए हुए एक और दोस्त को जिसका अंजाम तक़रीबन फै़ज़ की ही पहली मुहब्बत के अंजाम की तरह था, मैंने फै़ज़ की मशहूर नज़्म ‘तनहाई’ सुनायी। यक़ीन मानिये वह ज़ार ज़ार रो पड़ा। फिर मैंने उसे ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ सुनायी और नज़्म के बारे में अपने उस वामपंथी मित्र का नज़रिया भी सामने रखा। वह ख़ासा मुतासिर हुआ और वामपंथी विचारों की शरण में चला गया।

कॉलेज  की पढ़ायी ख़त्म हुई और मैं महानगर दिल्ली की एक प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी  में आ गया। यहां वामपंथ का एक नया दरीचा ख़ुला, नया चेहरा मिला जिसका मुझे ख्वाब  में भी गुमां नहीं था। यहॉं सज़्ज़ाद जहीर, अली सरदार जाफरी, रशीद जहां आदि के नामों के साथ फै़ज़ अहमद फ़ैज़ की शख्सियत के कई नए वरक़ खुले। लेकिन मेरे लिए फै़ज़ की शायरी में नूरजहां की आवाज़ का दर्द फिर भी मांद नहीं पड़ा था।
कुछ अरसे बाद एक ख़त आया जिसके आखिर में लिखा था ‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले‘। साथ में एक  ऑडियो  कैसेट भी जिसमें कुछ मशहूर गायकों द्वारा फै़ज़ का गाया हुआ क़लाम था। इसमें नूरजहां की गायी वह नज़्म भी थी-‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’। सोनी कंपनी के वॉकमैन प्लेयर पर मैंने फिर सुना-

रेशमो-अतलसो-कमख्वाब  में बुनवाए हुए
जा बजा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

इस बार एक अजीब क़ैफियत दिल पर गुज़री। लगा कि अभी तक मैं इस नज़्म को मेल वॉइस और मेल नैरेटिव में पढ़ रहा था। लेकिन असल में इसे फीमेल वॉइस और फीमेल नैरेटिव के बतौर भी पढ़ा जा सकता है। यह आज के वक़्त  के हिसाब से भी ज़्यादा सार्थक मालूम होगा। फ़ैज़ की शायरी के इस पहलू की ओर अचानक ही ध्यान गया। ऐसा शायद नूरजहां की आवाज़ और उनकी म्यूज़िकल अदायगी की वजह से हुआ। लगा कि उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से पुरुष के दर्द को स्त्री के दर्द में बदल दिया है। शायद तभी, जब 1943-44 के दरम्यान नूरजहां ने फै़ज़ से यह नज़्म गाने की इज़ाजत मांगी तो उसे सुनकर उन्होंने कहा कि -आज से यह नज़्म हमारी नहीं आपकी हो गयी। क्या, कह सकते हैं कि यह एक ऐसी नज़्म बन गयी जिसे एक मर्द ने लिखा। एक औरत ने गाया। और औरत ने समझा तो औरत को पाया और मर्द ने समझा तो मर्द को पाया। दोनों को ज़माने ने पाया। नज़्म को पढ़कर अब तक लगा था कि प्यार करने वाला अपने मेहबूब से कह रहा है- ‘और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। लेकिन नूरजहां को सुनकर पहली बार लगा कि कोई प्यार करने वाली अपने मेहबूब से कह रही है-

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
  राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग

(दिलीप शाक्य )

4 टिप्‍पणियां:

  1. itna clear sansmaran ek ek seen bilkul clear aur fir wahi dopahar khamoshi aur radio........
    bhai waah maza aa gaya
    zabardast

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  2. सर बहुत ही सुंदर लिखा है ख़ास तौर पर वो लड़कपन को जिस तरह से दर्शाया है .... बहुत अच्छा ...

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  3. साहब जी आप कवि हैं, लेखक हैं कि चित्रकार , समझ में नहीं आता, इसमें शब्दों से जो आपने चित्र उकेरी है लाजबाब है| मुंशी प्रेमचंद कि दो कहानियां नमक का दारोगा एवं पंच परमेश्वर मैंने दसवीं कक्षा में पढ़ी थीं| इन दोनों ही कहानियों में उर्दू का प्रयोग एवं माहौल का चित्रण बड़ा ही सुन्दर था| यादें ताजा हों गयीं|

    हम पंथ चाहे वो वाम हो या दक्षिण, इनके तो कद्रदान नहीं लेकिन इश्क ....मुहब्बत....जो लगाये ना लगे और बुझाये ना बने......के स्पेशल फैन हैं| इसलिए ग़ालिब, फैज़, कबीर और उन सभी के फैन है जो इश्कपंथी हैं|

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  4. Raghvndra ji ...tareef ke liye shukriya....thode plus minus ke sath hamara rasta bhi usi panth ki taraf jata hai.....
    chahe uski taraf muh karke khade ho jayen chahe peeth karke ...hain to usi ki taraf

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