16 अक्तूबर 2010

शहर के स्वप्न में

घर के पुराने कबाड़ से उठकर

एक टूटी हुयी साइकिल
ट्रैफिक सिग्नल पर इंतज़ार करते शहर के स्वप्न में आ पहुंची

उसे उस पोस्टमेन का इंतज़ार था
जो एक दोपहर
किसी मुकम्मल चिट्ठी का अधूरा पता ढ़ूढ़ते ढ़ूढ़ते
शहर से अचानक ग़ायब हो गया

शहर के स्वप्न में
एक खंडहर था जिसकी दीवार पर बची पीली घास
एक बहुत पुराने तालाब पर जमी हरी काई से झांकती सीढ़ियों को
एकटक देख रही थी
जिन पर
दूरी और समय के किसी अजीब मोड़ पर रुका
एक कत्थई अक्स कांप रहा था

शहर के स्वप्न में न दिन था
न रात थी
वहां समय की एक अजीबो-ग़रीब गर्दिश थी जिसमें
अपने ही भंवर में डूबती नदियों का शोर टूट रहा था

नदियां जिनके पानियों में उन घुड़सवारों की दास्तानें रवां थीं
जिनकी नींदों में पहली बार
उतरा था
किसी शहर के स्वप्न का मानचित्र

मेहराबों, गुंबदों और प्राचीरों की विशाल छायाओं से
घिरा था शहर
शहर में एक सुरंग थी
जिसमें अब भी मौज़ूद थे उन रास्तों के सुराग
जिनसे होकर शहर में लौट सकता था शहर का स्वप्न

शहर के स्वप्न में
शहर के कान नहीं थे शहर की ऑंखें नहीं थीं
शहर के स्वप्न में नहीं थी शहर की ज़ुबान तक
वहां एक निचाट खालीपन था

जिसमें ईश्वर से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करते
उन हाथों की लंबी कतारें थी
जिनके बाक़ी जिस्म
उस इमारत की तामीर का दंड भुगत रहे थे
जिसे उन हाथों ने किसी बादशाह के लिये नहीं
ख़ुद अपने और अपने जैसे और तमाम लोगों के लिये रचा था

उस निचाट खालीपन में
एक गर्दआलूद जेबघड़ी का साया तैर रहा था
जिसकी टिक टिक पर सांस लेता एक बूढ़ा चरखा
एक कमज़ोर लाठी को
उस ऐनक की दास्तान सुना रहा था

जिसकी नज़र एक रात अचानक धुंधली हो गयी
और सुबह होते ही
शहर के चेहरे ने बदल दिया जिसका लैंस और फ्रेम
धूप के चश्मों से भर गया था शहर

शहर में एक रात
आसमान से उतरा एक विशाल सिनेमाघर
जिसके हसीन पर्दे पर सालों साल चलती रही
हत्या रोमांस और तटस्थ हंसी से भरपूर एक पारिवारिक मनोरंजक फिल्म

कहते हैं उस सिनेमाघर में
इतनी सीटें थीं कि समा जाएं शहर के शहर एक साथ
और उसकी स्क्रीन का आकार तो इतना बड़ा था
कि उस पर लिखा जा सकता था एक पूरी सदी का महाकाव्य

गांवों क़स्बों से रेलों, मोटरों और लारियों में भरकर
खिंचे आ रहे थे
मेलों, गीतों और लोककथाओं की दुनिया के हज़ारों क़िरदार

सिनेमा की दुनिया में ऐसे खोए
कि भूल गए अपने ही पैरों के निशान
उनकी हथेलियों से ग़ायब हो गयीं भविष्य की रेखाएं
हूबहू एक जैसे हो गये सबके अंगूठों के हस्ताक्षर

सिनेमा देखते क़िरदार और फिल्म के बीच
सरकते रहे उनकी अपनी ज़िंदगी के अनगिनत अनसुलझे रहस्य
बिंब और आख्यान
जबकि फिल्म की रील में नहीं था उनके सपनों का एक भी नेगेटिव

शहर की सबसे पुरानी इमारत में
जिस समय
एक हसीन औरत के शफ्फाप बदन को चूम रहे थे
दो रक्ताभ होंट
शहर के गटर से उठी एक काले धुंए की अंतहीन सुरंग
शहर के चहरे पर उड़ने लगीं बदरंग हवाईयां
चौराहों पर दिनदहाड़े खुल गयी
जागती रात के तवील अफसानों की एक गुप्त किताब
सुबह की चाय में घुल गयी
अख़बार के पन्नों पर हर जगह बिख़री एक ख़ूनी दास्तान

शहर में रंगों की सियासत थी
और एक विकल्पहीन चुनाव में वोट देने की अनिवार्यता पर
चुप थे नागरिक

अपनी गलियों से बेगाना हो गया था शहर
शहर में एक हाइवे था
जिस पर लिखी थीं हत्या और लूट की अनगिनत वारदातें

शहर के स्वागत में प्रवेश द्वार पर लगी विशाल विज्ञापन पट्टिकाएं
आत्म ग्लानि से भरकर उड़ गयीं उस रात
शहर के स्वप्न में

रात के डांस फ्लोर पर
बियर के झाग में नहायी थी रौशनी
आसमान के काउंटर पर धुत पड़ा था पूरा चांद
हवा के फ्रेम में पहले की तरह हिल रही थीं धर्मो की ध्वजाएं
टेलीविज़न की ब्रेकिंग न्यूज़ में बड़े आराम से घूम रहे थे अपराधी
और अपने चहरे की प्लास्टिक सर्जरी में व्यस्त था शहर का निज़ाम भी
हर कोई अपनी जगह सुखी और सुंदर था शहर में

कि तभी एक अनजान दिशा से गति के सारे रिकॉर्ड तोड़ता एक चमगादड़
शहर की सबसे ऊंची और चमकीली इमारत से टकरा गया
शहर की देह पर भरभराकर गिर पड़ा
उसके मस्तक का सबसे बड़ा मुकुट

एक लकड़बघ्घे की भयानक हंसी से डरकर
अपने रहस्यमय प्रदेशों में भाग गए जंगल के सारे पक्षी

देखते देखते एक मलबे में बदल गया शहर
अपाहिजों से भर गये अस्पताल
अपने परिजनों के इंतज़ार में
सड़ती रहीं लाशें
उच्च स्तरीय बैठकों में होने लगीं घोषणाएं

प्रेस कॉन्फ्रेंसों के होश उड़ गये थे
खून के धब्बों से भर गयी थीं कैमरों की फ्लैश लाइटें

हर ब्रेक के बाद
टीवी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था
शहर के इतिहास की सबसे बड़ी चीख का ग्राफिक्स

गुप्त मंत्राणाओं में उलझे थे पुलिस के आला अधिकारी
माइक्रोस्कोप और मैग्नीफाइंग ग्लास पर झुकी थी
शहर की सबसे बड़ी आंख

खंगाले जा रहे थे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज
इतिहास भाषा और संस्कृति की धुंध में ढ़ूढ़े जा रहे थे
शहर को बचाने के उपाय

चौराहों गलियों और उदास बस्तियों में
तेज़ हो गयीं सर्चलाइटें
शहर की सरहदों से खदेड़े जा रहे थे सभी अवांछित लोग
रेल्वे स्टेशनों पर ट्रेनों की प्रतीक्षा में हाँफ रहे थे वापसी के हज़ारों टिकिट
कि तभी

अपना फटा कोट पहनकर चलती ट्रेन से शहर के स्वप्न में कूद गया
एक थका हुआ मुसाफिर
उसे अब तक नहीं मिला अपना स्टेशन
जबकि उसकी क़मीज़ के कॉलर पर अब भी छपा था
शहर के सबसे पुराने दर्ज़ी का पता

समय की किसी मनहूस घड़ी में ऐसी हवा चली
कि उलट गये दिशा के कांटे
समय के पहले ही फट गया आसमान का वाटरबैग

महीनों मुसल्सल गिरती रही एक बदरंग बारिश
बारिश में घुल गयी एक मरे हुये पक्षी की अंतहीन पुकार

प्यास प्यास चिल्लाता एक झरना टूटकर गिरा पहाड़ी के उस पार
बाढ़ में बह गए सूखे पड़े खेत मवेशियों के चारागाह

अपने आसमानों से बिछड़कर शहर के स्वप्न में भटक गया एक समंदर
खाली खाली हवाओं में उड़ते रहे
प्यास की शिद्दत में डूब गए एक घोड़े के
उदास पंख

शहर की मुठ्ठियों से फिसलती रही
इंतज़ार की रेत
रेत पर तड़पकर मिट गया एक चंद्रमा का प्रतिबिंब
रेत पर घिसटती रह गयी एक मछुआरे की नाव
रेत पर औंध पड़ा रहा युद्ध् से लौटा एक विशाल जलपोत

वीरान हो गये बाज़ार
लाशों से भर गये क़ब्रस्तान और श्मशानघाट
चील की तरह मंडराता रहा शहर के गोश्त पर एक हैलीकोप्टर

भेस बदलकर
शहर में घुस आए गिद्धों के जत्थे के जत्थे
उदास मन से अपने वृक्षों के साथ शहर के स्वप्न में उड़ गये
चिड़ियों के घोंसले

धीरे धीरे एक स्वप्नविहीन मरुस्थल में बदलता गया शहर
शहर में बढ़ती गयी मशीनों की पैदावार
बढ़ता गया फैक्ट्रियों का आतंक

मिडिल क्लास मिडिल क्लास गाते गाते टूट गयीं खयालों की प्यालियां
और विचारों के जाम

इतिहास की पाठ्य पुस्तकों से ग़ायब हो गये शहर के सारे विवरण
वहां एक उजाड़ रेगिस्तान बचा था
जिस पर
एक मरीचिका के पीछे बेतहाशा भागते ऊंटों की लाशें बिछी थीं

रेत पर अचानक उभर आए थे
रेगिस्तान की आत्मा में कहीं गहरे दबे
शताब्दियों पहले लौट गये खोजी सौदागरों के पद-चिह्न

उधर जंगल की आदिम बस्तियों में
किसी भयानक अंदेशे की तरह घूम रही थीं
प्यास की हज़ारों किंवदंतियां

एक बूढ़े डांगर की तरह सांसे ले रहा था लोकतंत्र
अपनी पूंछ को खुरों पर मारता
उसकी पीठ पर बैठी थी अपनी उड़ानों से बेतरह निराश
एक सुनहरी चिड़िया

रौशनी की तलाश में धुंध को काटता एक लकड़हारा
बदहवास होकर गिर पड़ा शहर के स्वप्न में

अपने वक़्त के भयानक अँधेरे और खौफ़ से घबराकर
शहर के स्वप्न का दरवाज़ा पीटता रहा
सूरज का सातवां घोड़ा
शहर की शर्म के पसीने में डूबता यह उसका आखिरी दिन था

आने वाली सुब्ह की ग़ुमशुदगी से बेख़बर
ट्रैफ़िक सिग्नल पर इंतज़ार करते शहर की प्रतीक्षा में
अपनी अंतहीन गुफा का दरवाज़ा खोलकर
तैयार बैठी थी रात

शहर के स्वप्न को लेकर
एक घने जंगल की अजनबी गहराईयों में उतरती जा रही थी सुबह

शहर में तेज हो गयीं सायरनों की आवाज़ें
सक्रिय हो गए गुप्तचर
कि अचानक

यातायात के सभी नियम तोड़कर
शहर के स्वप्न की तलाश में अदृश्य हो गयी एक पीली टैक्सी

(दिलीप शाक्य)

साभार : वागर्थ, अक्टूबर २०१०
लिंक : http://www.bharatiyabhashaparishad.com/

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन और इतनी लम्बी रचना का प्रवाह बनाए रखा आपने...... बहुत खूब....प्रभावी अभिव्यक्ति

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  2. सर बहुत अच्छी कविता है |

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