30 जुलाई 2010

महाप्रलय के बाद

समय के दलदल में
डूबता है सभ्यता का जंग लगा पहिया

किनारे खड़ा रोबोट
देखता है चुपचाप निर्विकार

खला में तैरती हैं
पक्षियों के टूटे हुये पंखों की उदास छायाएं

सन्नाटा टूटता है
दलदल के तल से उभरती हैं सहसा
छिपे हुये झींगुरों की असंख्य आवाज़ें

क्षितिज पर फूटती हैं रौशनी की किरणें

लौटती हैं पंखों की उदास छायाएं
लौटता है रोबोट
लौटता है सभ्यता का जंग लगा पहिया

(दिलीप शाक्य)

2 टिप्‍पणियां:

  1. Anzum saa'b... Liked this poem...but I have doubt whether I understood the real meaning that you wanted to convey......Please write a short comment elaborating the spirit of the poem.

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  2. real meaning to pata nahi raghu bhai bus itna sochta hoon ki jaise swarg se nikal kar adam ne apni duniya banai waise hi machine bhi yadi apna sansar khud rachne lag jaye to.....

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