6 मार्च 2010

क़त्ल

एक चाकू की दस्तक से
टूटकर बिखर गया
हिज्र की अंधेरी रात में
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख्वाब

होटल के कमरे की अलसायी रौशनी में
ख़ून के ध्ब्बों से भर गयी
मोनालिसा की पवित्र मुस्कान

किसी क्लियोपेट्रा के पोलडांस पर उत्तेजित
इस कविता की अंधेरी रात के नायक को
और भी उन्माद से भर गया
वस्ल की चांदनी के क़त्ल का समाचार

जबकि एक अनंत अवसाद में डूबता गया
चाकू का समूचा वज़ूद

कविता की अंधेरी रात से निकलकर
चाकू की नोक पर आ बैठा था
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख़्वाब
अपने विशाल पंख फैलाए
~ दिलीप शाक्य

5 टिप्‍पणियां:

  1. पहले भी पढ़ चुकी हूँ 'वर्तमान-साहित्य' में ....पर एक बार फिर 'हिज्र की अंधेरी रात में टूटकर बिखरते ख्वाब को देखना अच्छा लगा ......!!

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  2. hello sir,it is very nice kavita.Waise hame sahitye ka kuch khaas gyan nahi hai phir bhi aapki kavitayo mein ek tarah ka aakarshan hai jo hamare jaise yuvao ko prerit karta hai sahitye ki ore............

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  3. bahut shukriya...agar apko aisa laga to yeh in kavitaon ke liye faqr ki bat hai...apna nam pata chhodte to aur bhi achha lagta...

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  4. kya baat hai..maza aa gaya..

    ~ Sandeep Gupta
    http://GuruTalks.com

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  5. sr pehli bar apka blog pdha kafi maza aaya pdh ke or dekh ke v jada kuch nhi to inspiresion mil gai h ki mujhe v mehnat krni chahiye. me v jald kuch likhne wala hu pdhiyega jrur taki apni galtio ko sudhar sku

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