3 अगस्त 2010

घुड़सवारी

रात के गहरे अंधकार को चीरकर
समुद्र की लहरों से निकल रहा है एक घोड़ा

घोड़े के इंतज़ार में
समुद्र के किनारे खड़ा है एक सिरफिरा सवार
हाथों में थामे लगाम और रक़ाब
घोड़े की ज़बान पर चिपका है
आने वाले दिनों की अजनबी यात्राओं का स्वाद

शहर में हिनहिनाता घूम रहा है एक घोड़ा
अपने सवार के दस्तानों और जूतों की तलाश में
तितर बितर हो रही है भीड़
भीड़ में अदृश्य हो गया है एक घोड़ा
छोड़कर अपनी लगाम और रकाब

एक घोड़े के नायाब करतबों की तारी़फ में
बांधे जा रहे हैं कुछ ख़ूबसूरत पुल
पुलों पर चढ़े कुछ टेलिस्कोप
नीचे बह रही एक अनदेखी नदी का
अविस्मरणीय गीत गा रहे हैं
नदी की तलाश में
वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा
प्यासा ही लौट रहा है
उसकी आखों में झूल रही है
पुलों के नीचे चमक और शोर के अनंत में डूबी
कंक्रीट की एक लंबी सड़क

( दिलीप शाक्य )

15 टिप्‍पणियां:

  1. नदी की तलाश में
    वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा

    क्या बात कही है दिलीप आपने. मजा आ गया.

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  2. तीन अलग अलग दृश्य घोड़ों के - संकेत में बहुत कुछ कह गए आप दिलीप जी। शुभकामनाएं।

    सादर
    श्यामल सुमन
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  4. बहुत सुन्दर रचना है बधाई। पर्यावरण की हालत भी बिल्कुल ऐसे ही है..नदीयां खो रही हैं इस दोड़ में....बहुत सही कहा है-

    नदी की तलाश में
    वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा
    प्यासा ही लौट रहा है
    उसकी आखों में झूल रही है
    पुलों के नीचे चमक और शोर के अनंत में डूबी
    कंक्रीट की एक लंबी सड़क

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  6. वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा
    प्यासा ही लौट रहा है
    उसकी आखों में झूल रही है
    पुलों के नीचे चमक और शोर के अनंत में डूबी
    कंक्रीट की एक लंबी सड़क

    .... एक सुंदर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  7. तीन अलग अलग दृश्य घोड़ों के - संकेत में बहुत कुछ कह गए आप दिलीप जी ! .... एक सुंदर रचना के लिये शुभकामनाएं।

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