16 नवंबर 2014

ग़ज़ल

गो जाग रहे हैं, हमें सोने का गुमां है
फिर एक नए ख़्वाब में खोने का गुमां है
है नींद में झरने सी हंसी तेरे लबों की
सुर्ख़ी को लहर बन के चमकने का गुमां है
तुम ढ़ूढ़ रहे हो हमें जिस शहर में आकर
हमको भी उसी शहर में खोने का गुमां है
सीने को दबाती हुई मदहोश हवाएं
इनमें तेरी ज़ुल्फ़ों के बिख़रने का गुमां है
इस राह पे हम साथ हैं बरसों से मुसल्सल
मिलने का ग़ुमां है न बिछड़ने का गुमां है
इस बाग़ में ऐ जान-ए-अदा ये भी बहुत है
ख़ामोश परिन्दों को चहकने का गुमां है
है शेर-ओ-सुख़न ख़्वाब में चलने के सिवा क्या
सुनने का उन्हें है हमें कहने का गुमां है 
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 दिलीप शाक्य

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