16 नवंबर 2014

एक पीला त्रिकोण

आसमान में एक पीले त्रिकोण की तरह 
रुका हुआ हूं मैं 
बरसों से
धूप में जलता हूं तो बारिश मुझे
नहला देती है
अंधेरे से डरता हूं तो चांदनी मुझे
बहला देती है
अपनी ही दिशाओं का बंदी मैं
किसी स्थगित यात्रा के कटे हुए वृत्तांत-सा
टंगा हूं अनन्त में
मेरी भुजाओं में अलग होने की ताक़त तो है
मग़र एक अदृश्य वृत्त है उनके शीर्ष पर
निरंतर घूमता हुआ
बंधा हूं मैं उसी के तिलिस्म से
बेबस
धरती की हरीतिमा
और आकाश की नीलिमा के बीच जलते हुए
सूर्य से कहो
कि किसी बर्फीले प्रदेश में जाकर
ख़ुदकुशी कर ले
अगर नहीं पिघला सकता
मेरी भुजाओं के कसकते हुए संधि-स्थल
_____________
[दिलीप शाक्य]

1 टिप्पणी:

  1. सामर्थ्य के होते हुए कुछ न कर पाने की कसमसाहट को खूबसूरत शब्दों में समेटा !
    भावपूर्ण !

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