17 नवंबर 2014

मैं और वह

------------------कविता-श्रृंखला
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नवम्बर की ऐसी ही रात थी, जब ज़मीन से आसमान की ओर उठ रहे
बुगनबेलिया के बैंगनी पर्दे पर उसकी हंसी 
सितारों-सी बिखर गयी थी
मैंने उससे कहा: देखो, चांद से कितना रू-ब-रू है तुम्हारा चेहरा
तुम्हारा चांद तुम्हें ही मुबारक़ हो,
मुझे तो सूर्य का इन्तज़ार है: उसने चांद से चिढ़कर कहा
मैंने कहा: सूर्य में बड़े ब्लैकहोल्स हैं आजकल
तुम्हारा चांद कौन-सा बेदाग है: उसने कहा
दाग अच्छे हैं और मेरा मन एक साबुन की टिकिया है
मैंने हंसकर कहा और उसे गले लगा लिया
तब भी मुझे सूर्य ही कहो...मैं तुम्हारी सुब्ह हूं रात नहीं
उसे यही कहना था उसने यही कहा
मुझे भी किसी सुब्ह का इन्तज़ार नहीं था
मैं तो रात के समुद्र का नाविक था....
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[दिलीप शाक्य ]

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