7 मार्च 2014

ग़ज़ल

ये दिल का बाग़ शहर में खिला रहा हूं मैं
पलट भी आ ऐ गुलेतर बुला रहा हूं मैं

तुम्हारे पैर की आहट से गुलफिशां थी जो
वो शाख़ कबसे शज़र की हिला रहा हूं मैं

ये देख हंसता है मुझपे ज़माना सदियों से
शिक़स्ता साज़ है और सुर मिला रहा हूं मैं

चली है छेड़ तो कह दूं कि तू नहीं जानां
ये कार-ए-शौक़ जहां में चला रहा हूं मैं

बुलाओ तिश्नालबों को सजाओ मयख़ाना
कि फिर पियाले में सागर घुला रहा हूं मैं
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दिलीप शाक्य

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