4 मार्च 2014

ग़ज़ल

मैं इक सिरा हूं फलक का तो दूसरा है तू
कहूं तो कैसे ज़मीं से कि बस मेरा है तू

कुछ ऐसे जा कि मैं तड़पूं तेरी ही आमद को
पलट के आए तो कह दूं कि दूसरा है तू 

सजी है सेज सितारों के घर में आ सूरज
सुबह से शाम तलक धूप में फिरा है तू

है उसकी जागती आंखों से शबनमी ये गुल
ऐ मेरी रात के आंसू कहां गिरा है तू

हों क्यों न बज़्म में सरगोशियां ख़मोशी की
लबों पे उसके, मग़र मेरा तज़्किरा है तू

बढ़ा कि प्यास, मय-ए-शौक़ से लबालब मैं
बहुत-बहुत हूं यहां पर ज़रा-ज़रा है तू

गुलों के खिलने की उम्मीद अब भी बाकी है
है ज़र्द बाग़ मेरा, आ अगर हरा है तू 

____________________
 दिलीप शाक्य

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें