19 मार्च 2014

ग़ज़ल

खुली जो आंख तो तारों का जाल सा देखा
जो ख़्वाब में था हकी़की ख़याल सा देखा

नहीं था सामने मेरे तो था ख़ुदा सा तू
तुझे जो पाया तो पा के मलाल सा देखा

उठा ये दस्त-ए-तलब फिर किसी तमन्ना में
तुम्हारे रुख़ पे वही फिर जमाल सा देखा

हटा के रात के पर्दे को चांद तारों ने
दिलों के साज़ पे सांसों का सालसा देखा

इन आंधियों के मरासिम थे कुछ चरागों से
जो बुझ चुके थे उन्हें भी मशाल सा देखा
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दिलीप शाक्य

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