28 अप्रैल 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


शहर की ख़ू लगी है गांव भी छुटता नहीं है
ये कैसे रक़्स में है पांव कि रुकता नहीं है 

मुझे फिर रात के क़ातिल का ख़ंज़र देखना है 
सहर के रंग में मेरा लहू दिखता नहीं है 

वो अपने घर में मीनारें उठाकर पूछता है
झुकी जाती है छत क्यूं सर तेरा झुकता नहीं है

खड़ा है हाथ बांधे देर से घर का सिपाही
हैं बाहर जंग-से हालात पर चलता नहीं है

तड़पकर चाहे कितनी आह खींचे कोई, गुल्चीं
जो टूटे शाख़ से पत्ता तो फिर जुड़ता नहीं है

दिखाकर इश्क़ ने सब्ज़ा मझे सहरा दिया है
ये जाली नोट है बाज़ार में चलता नहीं है

है मेरा नुक़्ताचीं क्यों बेवजह आईना आख़िर
मैं वो रुख़ हूं जो अपने अक़्स में ढलता नहीं है

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


बुला रहा हूं ख़ुदाओं को आसमानों के 
घुला के दिल में समंदर कई ज़बानों के 

नए अहद में जगह कम है मेरी आमद को
किवाड़ खोल रहा हूं गए ज़मानों के 

जो आज रात मुनासिब हो मेरे घर आओ 
सुराग ढ़ूढ़ने चलते हैं फिर ख़ज़ानों के

अभी तो रात को बाज़ार से गुज़रना है
ऐ दिन शटर न गिरा तू अभी दुकानों के

वो अपने क़स्र की नक़्क़ाशियों में हंसते है
मिटा के नक़्श शहर से ग़रीबख़ानों के

बिखर चुका है सितमगर तिलिस्मे-ज़र तेरा
जमा हैं चौक पे मज़दूर कारख़ानों के

रुदन के धागों से तैयार हो रहे हैं लिबास
निकलने वाले फ़रिश्ते हैं नौहाख़ानों के

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


दर, बदर होता है दीवार से ख़ूं रिसता है 
तेज़ रौ शहर की रफ़्तार से ख़ूं रिसता है

दैर से गिर्जे से मस्जिद से खराबात से भी
बाम से कूचे से बाज़ार से ख़ूं रिसता है 

तिश्नगी फिर मेरे होटों पे खराशें डाले
फिर मेरे दस्ते-तलबगार से खूं रिसता है

फिर उसी ज़ीने पे चढ़ आयी हैं जख़्मी रुहें
फिर उसी ख़ाब की मीनार से ख़ूं रिसता है

फिर मेरे ख़ूं से गुलाबी है तेरे हुस्न का रंग
शहरे-ख़ूबां तेरे रुख़सार से ख़ूं रिसता है

राग बंदिश में है यां अम्न का गाउं कैसे
मेरी आवाज़ के मेयार से ख़ू रिसता है

हर्फ़े-आख़िर हूं मुझे हर्फ़े-मुक़र्रर न बना
नुक़्ता-ए-दर्द के विस्तार से ख़ूं रिसता है

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


खुली है ख़्वाब की खिड़की कोई क़यास करो
सियाह शब के मुक़द्दर में फिर उजास करो 

बना रहा हूं मैं चरखा नए ख़याल का, तुम
उधेड़ो जिस्म की रेशम को फिर कपास करो 

लिखोगे कौन सी तारीख़ खण्डहरों पे भला
कुछ इनके वास्ते तहज़ीब का लिबास करो

न दो मिसाल यहां दिलखराश नश्तर की
नए निज़ाम का मधुबन है सिर्फ़ रास करो

तुम्हारी रूह को आराम आ गया हो अगर
कोई सुकून का लम्हा इधर भी पास करो

नए सफ़र में नयी फ़स्ले-गुल का मंज़र हो
अब और क़ौम को रहबर न तुम उदास करो

शहर की भीड़ में चलती है इक ज़माने से
ये दुख की आंख है इसमें खुशी का वास करो

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


शहर को ढूढ़ने निकले थे स्याह रातों में 
ये किस ख़ला में चले आए बातों बातों में 

किसी नुजूमी के घर जा बुला सितारों को
नहीं हैं देख लकीरें हमारे हातों में 

लबों के सुर्ख़ समंदर में डूब जाउंगा
मैं एक दूब का तिनका फंसा हूं दांतों में

कोई अलाप उठाए तो दिल के तार बजें
उलझ रहे हैं ज़माने की वारदातों में

सफ़र तमाम करो मंज़िलों को जाने दो
बहक रहे हैं मुसाफ़िर नयी निज़ातों में

किसी का कर्ज़ बकाया चुका रहा है कोई
है दर्ज़ नाम किसी का उधारखातों में

हरेक बात है यकसां कहां जुदा हैं हम
निहां है तानें हमारी तुम्हारी नातों में

खड़े हैं दर्द की बारिश में मुंतज़िर कोई
पनाह मांगने आए हमारे छातों में

तेरी फ़तह से नहीं कम जो तू तलाश करे
मेरी शिकस्त का क़िस्सा समय की घातों में

26 मार्च 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य

फिर आज रंग है हर सू चमन में होली है 
पलाश फूल रहे हैं बदन में, होली है

ये कूल घाट ये गलियां ये चौक रंग में हैं
नगर में हाट में घर में सहन में होली है

है नील सुर्ख़ गुलाबी जहां सितारों का
गुलाल अर्श उड़ाए गगन में होली है

बिरज में फेंक रही है अबीर सखियों पर
बदल रही है ये राधा किसन में, होली है

चढ़ा है भांग का रंग फाग की धुनें है जवां
अवध के तन में बनारस के मन में होली है

न खिड़कियों से तको चुप गली में आओ भी
बता रहे हैं इशारे कहन में होली है

कोई हमारे भी लीडर से जा कहो यारो
नहीं है फ़िरकापरस्ती अमन में होली है

12 मार्च 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


खड़े हैं धूप में पर छांव से गिला भी नहीं 
बिखर गया जो सफ़र में वो काफ़िला भी नहीं 

तमाम शहर को अपना बना लिया, वैसे 
हमारा नाम था जिसपे वो घर मिला भी नहीं

बहुत से लोग हैं हम भी हैं क्या नया इसमें 
यूं चल रहे हैं गो चलने का सिलसिला भी नहीं

हमें चिनार की वादी में ले चलो फिर से
वहीं पे दिल को बुझा दें जहां जला भी नहीं

रकीब होगा किसी रोज़ अब तो मेहमां है
बुरा भी कैसे कहें उसको गो भला भी नहीं

बहुत खफ़ीफ़ है लहजा तुम्हारी बातों का
कहूं तो कैसे कहूं दिल में हौसला भी नहीं

ये कैसे सींच रहे हो शज़र को आंखों से
बदन की शाख़ पे देखो लहू खिला भी नहीं

जो मेरी आंख से गुज़रा है बरहना गुज़रा
लिबास ढ़ूढ़ रहा हूं वो जो सिला भी नहीं

वहां भी तेरा ख़लल है सुना गया है कोई
शहर हमारा नहीं है तो क्या ख़ला भी नहीं

तलाश कैसे किया जाए कुछ सुराग तो हो
वो खो गया है जो हमसे कभी मिला भी नहीं
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2 मार्च 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य

हर इक मुक़ाम पे पैकर बदल रही है तू
है किसकी सांस ज़माने से चल रही है तू

तुझे बना के ज़माने ने ख़ुद पे रश्क़ किया
मिटा के ख़ुद को ज़माना बदल रही है तू

सजा के मोर मुकुट सिर पे, बांसुरी छेड़े
अजीब ढंग से मधुबन को छल रही है तू

फिरुं मैं रात के जंगल में अपना चांद लिए
शहर में सुब्ह की सूरत निकल रही है तू

खड़े हैं लोग तेरी रहगुज़र में संग लिए
है जिस्म ख़ून से तर फिर भी चल रही है तू

बहुत नयी है पुरानी भी है ख़लिश तेरी
हरेक शख़्स की आंखों में जल रही है तू

ख़ुदा की ख़ल्क है गर तू मैं तेरी ख़ल्क रहूं
मुझे संभाल के ख़ुद भी संभल रही है तू

25 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल/ दिलीप शाक्य

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या मेरे ख़्वाब की दुनिया मुझे नवाज़ करो
या ख़ुद को अपनी निगाहों में शर्मसार करो
 
ये किसकी आंख का मंज़र मुझे दिखाते हो 
मैं बाज़ आया मनाज़िर मेरे बहाल करो
 
तुम्हारे अहद की तस्वीर बन नहीं सकता
ख़ुदा के वास्ते वापस मुझे किताब करो
 
क्यों इश्तहार की सूरत लुभा रहे हो मुझे
छिपा है दिल की तहों में जो राज़ फ़ाश करो
 
मैं घर में आया हूं जबसे उदास बैठे हो
न अपने आपको मुझसे यूं बेनियाज़ करो
 
ये नीम नीम उजाला मुझे क़ुबूल नहीं
चराग़ जलता है कम कम इसे मशाल करो
 
हमारे तर्ज़े-बयां पर जो हंस रहे हो बहुत
तो आओ आग को पानी गुलों को ख़ार करो
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23 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल /दिलीप शाक्य




डुबो के ख़ून में धागे रफ़ू लिबास किया
यूं हमने जिस्म को फिर जां से रूशनास किया

उलझ रहे थे जो रेशे जुदा जुदा होकर 
सुलझ रहे हैं इन्हें जब से पास-पास किया 

वो बात बात पे रेशम का ख़्वाब बुनता था
मैं अपने चरखे पे क़ायम रहा कपास किया

मेरी कबीर से, ग़ालिब से, आशनाई है
गिला नहीं जो मुझे तूने नाशनास किया

जो इसमें आता है सूरत बदल के जाता है
ये क्या बनाया है तूने ये क्या क़यास किया

तमाम शहर को बाज़ार कर दिया पहले
फिर अपने आप से पूछा कहां निवास किया

मैं घर को लौट के अक्सर हिसाब देता हूं
सफ़र में किसको हंसाया किसे उदास किया
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ग़ज़ल / दिलीप शाक्य

नई है शाख़ गुलों पर जमाल आया है
गिरा फिराक़ का पर्दा विसाल आया है

गले लगाके सुना हाले-दिल मुसाफ़िर को
तेरी तलाश में होकर निढाल आया है

है चांद रात सुलगती है ख़्वाब की टहनी
फिर आज नींद में तेरा ख़याल आया है

जो आस्मां पे बसाया था जलके राख हुआ
घर इक ज़मीं पे बनाऊं ? सवाल आया है

परिंदे बाग़ में रोते हैं ख़ून के आंसू
फिर एक बार शहर में अकाल आया है

जगाऊं दिल को चलूं आज उसको समझा दूं
मेरे लहू में बला का उबाल आया है

हटाओ मलबा इमारत नयी बुलंद करें
ज़माना हाथ में लेकर कुदाल आया है

16 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


लगे जो आंख को झपकी जगा दिया जाए
रूके जो ख़्वाब का चरखा चला दिया जाए 

मना रहा हूं सहर को नए सफ़र के लिए
गुज़िश्ता रात का हर दुख भुला दिया जाए

जो दिल जला है इधर से उधर उजाला क्यों 
ये दरमियान का पर्दा गिरा दिया जाए

ज़माना सख़्त है जालिम से गुफ़्तगू कैसी
सितम को रेत की सूरत उड़ा दिया जाए

दरख़्त अपनी जड़ों को लपेटे फिरते हैं
हमारे शहर का जंगल बसा दिया जाए

ये रास्ता भी उसी घर के सिम्त जाता है
इसे भी आज गुलों से सजा दिया जाए

उठा रहा हूं वही बात फिर नए रुख़ से
हुजूमे-शहर को वापस बुला दिया जाए

12 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य

हर एक सिम्त खिज़ां की, बहार मेहमां है
गुलों का बाग़ पे देखो तो कितना एहसां है

हर एक चश्म मेरे दर्द से पशेमां है
बस एक तू है जो हर आह से गुरेज़ां है

फरेब दे के मुझे मुस्कुराए जाता है
ये आईना क्या मेरे अक़्स का निगेहबां है

खड़ा हूं हाथ में लेकर गुलाब कब से मैं
हर एक शख़्स मुझे देखकर यां हैरां है

तुम्हारा ख़ाब मेरे ख़ाब से अलग क्यों है
हमारी नींद में शब का ख़लल तो यक्सां है

तू फिर बहार की बातें न कर इसे लेकर
ये रहगुज़र तो तेरे ही सफ़र से वीरां है

किसी तरह हो इसे बह्र तक तो जाना है
तुझे जो कुफ़्र है दरिया तो मुझको ईमां है

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* यक्सां- एक सा , बह्र- समुद्र  

31 जनवरी 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य

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दोस्तों की शाम को गुलज़ार करके देखिए
इश्क़ के सहरा को फिर बाज़ार करके देखिए

ज़िंदगी के हुस्न का हर बाब खुलता जाएगा
दैरो-हरम के द्वार को दीवार करके देखिए

जल रही है दिल में जो शामो-सहर इक रात से 
ख़्वाब की उस ईंट को मीनार करके देखिए 

दर्द की शिद्दत है क्या शायद उसे मालूम हो 
चारागर को इक दफ़ा बीमार करके देखिए

क्या पता दिल की ख़लिश मानिंदे-कस्तूरी लगे
आज फिर उसकी नज़र का वार करके देखिए

ख़ूने-दिल से हमने सींचा है ये काग़ज़ का गुलाब 
खिल उठेगा आप कुछ गुफ़्तार करके देखिए 

देखिए हमको नहीं शेरो-ओ-सुख़न से वास्ता 
हमको ग़ालिब की तरफ़ दीदार करके देखिए
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23 जनवरी 2013

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


शहर में है मग़र मुझसे कभी मिलता नहीं वो 
रकीबों तक से मेरे नाम पर खुलता नहीं वो 

पलटता है मग़र कुछ इस तरह जैसे खफ़ा हो 
मिलाकर हाथ चल देता है कुछ कहता नहीं वो 

न जाने बाग़ में गुलचीं ने क्या बुलबुल को समझाया 
कि आआ के पलट जाती है रूत, खिलता नहीं वो 

ज़रा सी शाख़ लचकी थी बस इतनी बात पर ही 
तड़पकर इस तरह टूटा कि अब जुड़ता नहीं वो 

यहां दिन रात बहता था जो दरिया खो गया है 
सितारों तक भटकता हूं, कहीं दिखता नहीं वो 

वो पलकों में दबाकर मेरा चेहरा सो गया है 
जगाता हूं अधूरे ख़्वाब सा, उठता नहीं वो 

ये मेरा दिल अब उसका मक़बरा है सैर को आओ 
बिछी है घास रौंदो उसको कुछ कहता नहीं वो 
 

23 दिसंबर 2012

लम्बी कविता ‘गुलाब की पत्तियां और कैंची’ से एक अंश


तो क्या हुआ कि आज अपनी ही सलवटों में लिपटे हुए 
परचमों को 
बहुत क़रीब से देख रहा हूं मैं 
किसी पार्टी-वर्कर की तरह 
हवा के रुख़ पर शर्मिंदा होता हुआ 

तुम्हें भी तो देख रहा हूं मैं तुम्हारी ही तरह
मेरी हमनफ़स
हवा के रुख़ को कई-कई दिशाओं में मोड़ते हुए बे-खौफ़
तोड़ते हुए भीतर की मजबूत श्रंखलाएं
कड़ी-दर-कड़ी
तुम अभूतपूर्व लग रही हो मेरे भीतर और बाहर खड़ी
चैलेंज-सी...

(दिलीप शाक्य)

लम्बी कविता ‘गुलाब की पत्तियां और कैंची’ से एक अंश



नीली रात की अलगनी पर टांगकर सितारों की झालरें 
अपनी डायरी में लिख रहा है चांद 
उन लड़कियों की मुख़्तसर दास्तानें 
जिन्हें उनके क़ातिलों ने 
घने जंगलों में ज़हर देकर सुला दिया था 
अपने गुनाहों का लिबास छोड़कर वे 
किसी शहर के शॉपिंग-मॉल में सजे-धजे घूम रहे होंगे 
धूप के चश्मे लगाए 
धूप के चश्मों में बड़ी उदास दीखती है महानगर की रात

महानगर की रात उस जंगल की रात से कम भयानक नहीं थी
जिसके बारे में एक मोची का बयान था कि
वह चमड़े की शराफ़त के पीछे
आदमी पर पेड़ से वार करता है
यक़ीनन, सुदामा पाण्डेय धूमिल यक़ीनन
मग़र तुम यह कहना भूल गए
कि उसकी सबसे घातक चोट औरत पर पड़ती है

औरत जो इस वक्त
भाषा में आदमी होने की तमीज का सबसे बड़ा प्रतीक है

/ -दिलीप शाक्य

30 नवंबर 2012

ग़ज़ल / दिलीप शाक्य


वरक़ ज़िंदगी का उलटते रहे हम
कहॉं तेरी जानिब पलटते रहे हम

कभी दर खुलेगा इसी आरज़ू में
जबीं आस्तां पर रगड़ते रहे हम

वो आए हमें खोजने जब शहर में
घने जंगलों में भटकते रहे हम

इधर बाग़-ए-दिल में कई फूल आए
मग़र तेरी ख़ुश्बू में जलते रहे हम

लबों पर लबों का तबस्सुम न आया
बहुत खूं की रंगत बदलते रहे हम

कहॉं जाके यारो खुदी को मिटाते
यहीं अपने घर में टहलते रहे हम

ये आईना हमसे बहुत आशना था
इसी में बिगड़ते-संवरते रहे हम










13 अक्टूबर 2012

लंबी कविता ‘गुलाब की पत्तियॉं और कैंची’ से एक अंश


तितलियों, तितलियों तुम कहॉं हो?
हम कब से पुकार रहे हैं
हमारी मसें भीग रही हैं
हमारा दिल धड़क रहा है
बाग़वान की कैंची के शिकार होने से पहले
हम तुम्हारे परों से लिपट जाना चाहते हैं
हम ओस की बूंदों में नहाकर आए हैं
अछूती सॉंसों में खुश्बुओं की सरगोशियॉं लाए हैं

                            -दिलीप शाक्य


17 जून 2012

बहेलिए के नाम एक संदेश ...


वो चिड़िया जिसके सिर पर सुंदर कलगी है
वो चिड़िया जिसके पंख बहुत चमकीले हैं
वो चिड़िया जिसकी बोली के सुर गीले हैं
उस चिड़िया को तुम पिंजरे से आज़ाद करो

वो चिड़िया जिसने दूब के धानी तिनकों से
इक पेड़ की शाख पे एक नशेमन छाया था
जिसमें चिड़िया के सपनों का सरमाया था
उस चिड़िया को उन सपनों में आबाद करो

उस चिड़िया पर जो जुल्मो-सितम की बारिश की
तुम अपने दिल से पूछो कितने पाप किए
जो औरों से करवाए और जो आप किए
उन पापों का अब खुलकर पश्चाताप करो

उस चिड़िया को तुम पिंजरे से आज़ाद करो
उस चिड़िया को उन सपनों में आबाद करो

                                                 (-दिलीप शाक्य )

6 जून 2012

स्कैच-21



चाकुओं ने विनम्र होकर त्याग दी
अपनी बरसों पुरानी धार
और खेतों में हल की मूठ बनकर खड़े थे

उन्ही कर्मठ हाथों के इंतजार में
जो किसी पुराने महल के मलबे में
फ़ोसिल्स की तरह दबे थे ...

(लम्बी कविता 'आग के उदास स्कैच' से एक अंश )
                                     
                                      -दिलीप शाक्य


स्कैच -2


एक उजड़े हुए मधुबन की हींस में
बरसों बाद
फिर छिड़ा
दो घायल पक्षियों का महारास

तपते हुए मरुस्थलों की गहरी नींद में
फिर
उतरने लगा
हरी घास का लहलहाता स्वप्न

(लम्बी कविता 'आग के उदास स्कैच' से एक अंश )
                                   
                        -दिलीप शाक्य


4 जून 2012

स्कैच-1


की-बोर्ड पर झुकी उँगलियों ने जैसे ही टाइप की
उजाले की स्पेलिंग

रात के अँधेरे में डूब गई
सात रंगों की विशाल आसमानी स्क्रीन

जल उठा
चाँद का दूधिया मिंटल

अंतरिक्ष में जुगनुओं की तरह
फैल गए  सितारों के  छिपे हुए जुलूस ...
_________________________________
[दिलीप शाक्य / लम्बी कविता 'आग  के उदास  स्केच' से एक  अंश ..]
                                     -


15 मई 2012

एक स्त्री ने एक पुरुष को पुकारा

धुंध  में तड़ित  की तरह लहराई 
सेज  पर बेहिस  पड़ी 
एक  उदास  आवाज़  
सुदूर जंगल  की कटीली झाड़ियों को चीरता 
दुगने वेग  से लौटा 
एक  लहू लुहान  घोड़ा 
अपनी कौम  से अलग  होकर 
........................
........................
धुंध  में बाहें फैलाकर 
एक  स्त्री ने एक  पुरुष को पुकारा 
एक  पुरुष के  हाथ  में  पिस्टल  थी  
और हवा  में  फैल  चुकी थी खून  की कच्ची बू 
.......................
.......................
हरे पेड़ों के झुरमुट से दिखी 
एक  औरत  की नीली पीठ 
चेहरे की जगह 
एक  पतंग  थी ओस  में भीगी हुई अम्लान 
.......................
......................
(लम्बी कविता 'आग  के उदास  स्केच' से एक  अंश ...)

                                     -दिलीप शाक्य 

26 मार्च 2012

उन्मुक्त सांसों की धुन...

दरख्तों के नंगे चिकने तनों पर
हवाओं के बोसे ग़ज़ल लिख रहे हैं

दम साधकर आसमां सुन रहा है
मुहब्बत की उन्मुक्त सांसों की धुन

सितारों जड़ी रात
हँस- हँस के दोहरी हुई जा रही है ...

(-दिलीप शाक्य )

16 मार्च 2012

कहीं तुम भी तो मेरी तरह किसी........???

(वर्चुअल रिअलिटी  का एक रिफ्लेक्शन )


आवाज़ और उजाले की पिघली हुई छायाओं के बीच
नीली तितलियों की तरह
मेरी नींद में, कल रात
बहुत देर तक उड़ते रहे तुम्हारे फेस-बुक स्टेटस
और एक वीडियो-लिंक ने तो चित ही कर दिया मुझे

पीड़ा और रोष के जीवित दस्तावेज़ बनकर
बहुत दूर तक दौड़ते रहे तुम्हारे कमेंट्स
मेरी हॉंफती रगों में...
अपने लिबास की धूल झाड़कर उठा मैं किसी तरह

पानी पीकर बैठा ही था
कि एक चैट-रूम से बुलावा आ गया
पहाड़ों, नदियों, समंदरों को पार कर कुछ ही क्षणों में
पहुंचा एक अजनबी देश में

वहॉं एक-दूसरे से ऐसे मिल रहे थे सब
सदियों के बिछड़े हों जैसे

मैं भी दाखिल हो ही रहा था एक नशीली दास्तान में
कि इन-बॉक्स में एक ई-मेल देखकर
ठिठक गए मेरे क़दम...
नींद टूट चुकी थी
खुलकर बड़ी हो चुकी थीं ऑंखें
हाथ मलने के सिवा काई चारा नहीं था

रात के जंगल में एक उदास भेड़ की तरह
सुबह से पहले ही लौट गया था चॉंद...

एक नये राष्ट्र् का जन्म हो चुका था
जो विश्व के हर राष्ट्र् के भीतर
आकार ले रहा था
हर मानचित्र के बाहर फैल रही थीं जिसकी सीमायें

कितना लाजवाब तथ्य था, कि मैं
इस नए राष्ट्र  का नागरिक था और मुझे ही ख़बर नहीं थी
...ई-मेल में मेरा नागरिक पहचान-पत्र अटैच था
और अब मुझे
अपनी नागरिकता का शुल्क अदा करना था...

मेरे जाने-अनजाने दोस्तो... अपना मेल-बॉक्स देखते रहो
कहीं तुम भी तो मेरी तरह किसी........???

(-दिलीप शाक्य)

19 फ़रवरी 2012

फिर उसे हमने किसी आँख में ठहरा देखा

उसके हाथों में कोई फूल सा चेहरा देखा
फिर उसे हमने किसी आँख में ठहरा देखा

दिन फिरा धुंध की चादर  को लपेटे दिन भर
रात की बाँहों में सिमटा हुआ कोहरा देखा

रात भर चाँद जला साज़ बजा रक्स हुआ
ता सहर बज़्म ने आकाश सुनहरा देखा

दिन उगा, फूल खिले, शहर में सब्ज़ा हर सू
उसने हर रंग में एक रंग सा गहरा देखा

हर तरफ आज वही देख रहा है दरिया
उसने कल इश्क़ में तपता हुआ सहरा देखा

                                -(दिलीप शाक्य)

17 मई 2011

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग






‘‘हमने जो तर्ज़े-फुगां की थी क़फस में ईज़ाद
          फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयां ठहरी है’’



गर्मियों की एक ढलती हुई दोपहर है। हल्की पीली धूप में गेंहू की पकी हुयी फसल का रंग सोने सा दमक रहा है। कुंए पर घूम रहे रहट के पानी में सूरज की किरणें चमक रही हैं। बैलों के गले में बंधी घंटियां बीच बीच में बज उठती हैं। नीम के घने दरख्तों की  शाखों से रह रह कर एक कोयल की पुकार उठ रही है। फ़ज़ा में कहीं से मेहदी की ख़ुश्बू उड़ रही है। एक अफसुर्दा सी शाम ख़ुलने के क़रीब है और एक बेरी के झाड़ की छाया में मरफी कंपनी के एक पुराने ट्रांजिस्टर से निकलकर सुरों की मलिका नूरजहां की आवाज़ का दर्द हवा में मदहोश होकर बिख़र रहा है। 

‘‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग
मैने समझा था कि तू है तो दरख्शां  है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
  तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है''

यह है फैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी से मेरी पहली मुलाक़ात की धुंधली सी याद। लेकिन यह तब की बात है जब न फैज़ का नाम सुना था न नूरजहां का और न ही नज़्म को सुनने और समझने का ठीक ठीक सलीका था। मैं चंबल की घाटियों में बसे एक दूरस्थ क़स्बे के सामान्य से स्कूल का विद्यार्थी था। लेकिन दिल साइंस की किताबों के बनिस्बत कर्नल रंजीत के जासूसी नॉविलों और ट्रांजिस्टर पर बजने वाले सुरीले संगीत में  अधिक धड़कता था। बाद में यह सिलसिला उसी तरह छूट गया जैसे लड़कपन का कोई इश्क़ या किसी पुरानी क़मीज़ का रंग।
आगे कॉलेज की पढ़ायी के दौरान, 1975 में हिंद पॉकेट बुक्स से  छपी एक पीली सी किताब हाथ लगी ‘उर्दू की बेहतरीन शायरी’। संपादक थे प्रकाश पंडित। इस किताब से पहली बार पता चला कि लड़कपन में ट्रांजिस्टर पर जो नज़्म सुनी थी, वह किसी फैज़ अहमद फैज़ नाम के शायर की थी जो 1911 में पाकिस्तान के सियालकोट में पैदा हुआ था। उस पुरानी याद के लिहाज में फै़ज़ की इस शाहकार नज़्म को कुछ कच्ची पक्की समझ के साथ ध्यान से पढ़ा। तब यही समझा था कि यह एक एक ऐसे आशिक के बारे में है जो अपने मेहबूब के साथ यह कहकर चला होगा कि ‘तेरी आखों  के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है’ लेकिन बाद में ज़माने से उलझा तो उसे समझ आया कि ‘और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा। राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ लिहाजा ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’। बहुत लॉजिकल मांग थी। लेकिन उस वक़्त  हमारे मतलब की नहीं थी। अतः अपनी उमर के दूसरे नौजवानों की तरह हम भी जगजीत सिंह, पंकज उधास और गुलाम अली के नाम से ऑडियो  कैसेटों की दुकान पर बिकने वाले शायरों के इश्क़िया ख़यालों में मसरूफ हो गए।
फिर वह हादसा पेश आया जिसकी वजह से फैज़ की शायरी से हुयी यह छोटी सी मुलाक़ात एक संगीन रोमांस में बदल गयी। हुआ यूं कि एक दोस्त को नया नया इश्क़ हुआ। तो उस दर्द की ख़ुशी में उसने बसंत के दिनों की एक दोपहर हमें एक रेस्तरां में दावत दी। वहॉं एक ऐसे व्यक्ति से मिलना हुआ जो किसी वामपंथी संगठन की क्षेत्रीय इकाई के सक्रिय सदस्य थे और प्रगतिशील विचारों की एक छोटी सी पत्रिका भी निकालते थे। उन्होंने बेहद बेतकल्लुफ अंदाज़ में अगले ही दिन होने वाली अपनी एक बैठक में आने का न्योता दे डाला। वहीं पहली बार ‘कॉमरेड’ और ‘लाल सलाम’ जैसे शब्द सुने। और फैज़ का वह तराना भी ...

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
एक खेत नहीं एक बाग नहीं हम सारा आलम मांगेंगे

जब उस वामपंथी मित्र से पूछा कि यह ख़ूबसूरत तराना किसने लिखा है तो जवाब आया- फ़ैज़ अहमद फ़ै़ज़। मैंने कहा- वही जिन्होंने ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ लिखा है। वह चैंके। बोले ‘तुमने पढ़ा है फैज़ को’। मैंने कहा ‘बस यही एक नज़्म’। उन्होंने तुरंत अपने झोले से एक किताब निकालकर मेरे हाथों में रख दी। वह किताब थी अब्दुल बिस्मिल्लाह द्वारा संपादित फ़ैज़ की शायरी का हिंदी संकलन ‘सारे सुख़न हमारे’। फिर उन्होंने वहीं एक नुक्कड़ पर दो मेहनतकश हाथों की बनी एक चाय पेश करते हुए ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ पर लंबा तब्सरा कर डाला। वहां मेरे समक्ष पहली बार इस नज़्म में छिपे असली मानी प्रकट हुये। इसका पसमंज़र और इसमें छिपे नयी रौशनी के सुरागों की झलक मिली। नज़्म की ये सतरें दिल में जैसे अटक सी गयीं

अनगिनत सदियों की तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा बजा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

इस तरह फ़ैज़ की शायरी के साथ मेरा रोमांस शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद नौजवानी के इश्क़ में चोट खाए हुए एक और दोस्त को जिसका अंजाम तक़रीबन फै़ज़ की ही पहली मुहब्बत के अंजाम की तरह था, मैंने फै़ज़ की मशहूर नज़्म ‘तनहाई’ सुनायी। यक़ीन मानिये वह ज़ार ज़ार रो पड़ा। फिर मैंने उसे ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’ सुनायी और नज़्म के बारे में अपने उस वामपंथी मित्र का नज़रिया भी सामने रखा। वह ख़ासा मुतासिर हुआ और वामपंथी विचारों की शरण में चला गया।

कॉलेज  की पढ़ायी ख़त्म हुई और मैं महानगर दिल्ली की एक प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी  में आ गया। यहां वामपंथ का एक नया दरीचा ख़ुला, नया चेहरा मिला जिसका मुझे ख्वाब  में भी गुमां नहीं था। यहॉं सज़्ज़ाद जहीर, अली सरदार जाफरी, रशीद जहां आदि के नामों के साथ फै़ज़ अहमद फ़ैज़ की शख्सियत के कई नए वरक़ खुले। लेकिन मेरे लिए फै़ज़ की शायरी में नूरजहां की आवाज़ का दर्द फिर भी मांद नहीं पड़ा था।
कुछ अरसे बाद एक ख़त आया जिसके आखिर में लिखा था ‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले‘। साथ में एक  ऑडियो  कैसेट भी जिसमें कुछ मशहूर गायकों द्वारा फै़ज़ का गाया हुआ क़लाम था। इसमें नूरजहां की गायी वह नज़्म भी थी-‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग’। सोनी कंपनी के वॉकमैन प्लेयर पर मैंने फिर सुना-

रेशमो-अतलसो-कमख्वाब  में बुनवाए हुए
जा बजा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

इस बार एक अजीब क़ैफियत दिल पर गुज़री। लगा कि अभी तक मैं इस नज़्म को मेल वॉइस और मेल नैरेटिव में पढ़ रहा था। लेकिन असल में इसे फीमेल वॉइस और फीमेल नैरेटिव के बतौर भी पढ़ा जा सकता है। यह आज के वक़्त  के हिसाब से भी ज़्यादा सार्थक मालूम होगा। फ़ैज़ की शायरी के इस पहलू की ओर अचानक ही ध्यान गया। ऐसा शायद नूरजहां की आवाज़ और उनकी म्यूज़िकल अदायगी की वजह से हुआ। लगा कि उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से पुरुष के दर्द को स्त्री के दर्द में बदल दिया है। शायद तभी, जब 1943-44 के दरम्यान नूरजहां ने फै़ज़ से यह नज़्म गाने की इज़ाजत मांगी तो उसे सुनकर उन्होंने कहा कि -आज से यह नज़्म हमारी नहीं आपकी हो गयी। क्या, कह सकते हैं कि यह एक ऐसी नज़्म बन गयी जिसे एक मर्द ने लिखा। एक औरत ने गाया। और औरत ने समझा तो औरत को पाया और मर्द ने समझा तो मर्द को पाया। दोनों को ज़माने ने पाया। नज़्म को पढ़कर अब तक लगा था कि प्यार करने वाला अपने मेहबूब से कह रहा है- ‘और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। लेकिन नूरजहां को सुनकर पहली बार लगा कि कोई प्यार करने वाली अपने मेहबूब से कह रही है-

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
  राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मांग

(दिलीप शाक्य )

16 अक्टूबर 2010

शहर के स्वप्न में

घर के पुराने कबाड़ से उठकर

एक टूटी हुयी साइकिल
ट्रैफिक सिग्नल पर इंतज़ार करते शहर के स्वप्न में आ पहुंची

उसे उस पोस्टमेन का इंतज़ार था
जो एक दोपहर
किसी मुकम्मल चिट्ठी का अधूरा पता ढ़ूढ़ते ढ़ूढ़ते
शहर से अचानक ग़ायब हो गया

शहर के स्वप्न में
एक खंडहर था जिसकी दीवार पर बची पीली घास
एक बहुत पुराने तालाब पर जमी हरी काई से झांकती सीढ़ियों को
एकटक देख रही थी
जिन पर
दूरी और समय के किसी अजीब मोड़ पर रुका
एक कत्थई अक्स कांप रहा था

शहर के स्वप्न में न दिन था
न रात थी
वहां समय की एक अजीबो-ग़रीब गर्दिश थी जिसमें
अपने ही भंवर में डूबती नदियों का शोर टूट रहा था

नदियां जिनके पानियों में उन घुड़सवारों की दास्तानें रवां थीं
जिनकी नींदों में पहली बार
उतरा था
किसी शहर के स्वप्न का मानचित्र

मेहराबों, गुंबदों और प्राचीरों की विशाल छायाओं से
घिरा था शहर
शहर में एक सुरंग थी
जिसमें अब भी मौज़ूद थे उन रास्तों के सुराग
जिनसे होकर शहर में लौट सकता था शहर का स्वप्न

शहर के स्वप्न में
शहर के कान नहीं थे शहर की ऑंखें नहीं थीं
शहर के स्वप्न में नहीं थी शहर की ज़ुबान तक
वहां एक निचाट खालीपन था

जिसमें ईश्वर से अपनी मृत्यु की प्रार्थना करते
उन हाथों की लंबी कतारें थी
जिनके बाक़ी जिस्म
उस इमारत की तामीर का दंड भुगत रहे थे
जिसे उन हाथों ने किसी बादशाह के लिये नहीं
ख़ुद अपने और अपने जैसे और तमाम लोगों के लिये रचा था

उस निचाट खालीपन में
एक गर्दआलूद जेबघड़ी का साया तैर रहा था
जिसकी टिक टिक पर सांस लेता एक बूढ़ा चरखा
एक कमज़ोर लाठी को
उस ऐनक की दास्तान सुना रहा था

जिसकी नज़र एक रात अचानक धुंधली हो गयी
और सुबह होते ही
शहर के चेहरे ने बदल दिया जिसका लैंस और फ्रेम
धूप के चश्मों से भर गया था शहर

शहर में एक रात
आसमान से उतरा एक विशाल सिनेमाघर
जिसके हसीन पर्दे पर सालों साल चलती रही
हत्या रोमांस और तटस्थ हंसी से भरपूर एक पारिवारिक मनोरंजक फिल्म

कहते हैं उस सिनेमाघर में
इतनी सीटें थीं कि समा जाएं शहर के शहर एक साथ
और उसकी स्क्रीन का आकार तो इतना बड़ा था
कि उस पर लिखा जा सकता था एक पूरी सदी का महाकाव्य

गांवों क़स्बों से रेलों, मोटरों और लारियों में भरकर
खिंचे आ रहे थे
मेलों, गीतों और लोककथाओं की दुनिया के हज़ारों क़िरदार

सिनेमा की दुनिया में ऐसे खोए
कि भूल गए अपने ही पैरों के निशान
उनकी हथेलियों से ग़ायब हो गयीं भविष्य की रेखाएं
हूबहू एक जैसे हो गये सबके अंगूठों के हस्ताक्षर

सिनेमा देखते क़िरदार और फिल्म के बीच
सरकते रहे उनकी अपनी ज़िंदगी के अनगिनत अनसुलझे रहस्य
बिंब और आख्यान
जबकि फिल्म की रील में नहीं था उनके सपनों का एक भी नेगेटिव

शहर की सबसे पुरानी इमारत में
जिस समय
एक हसीन औरत के शफ्फाप बदन को चूम रहे थे
दो रक्ताभ होंट
शहर के गटर से उठी एक काले धुंए की अंतहीन सुरंग
शहर के चहरे पर उड़ने लगीं बदरंग हवाईयां
चौराहों पर दिनदहाड़े खुल गयी
जागती रात के तवील अफसानों की एक गुप्त किताब
सुबह की चाय में घुल गयी
अख़बार के पन्नों पर हर जगह बिख़री एक ख़ूनी दास्तान

शहर में रंगों की सियासत थी
और एक विकल्पहीन चुनाव में वोट देने की अनिवार्यता पर
चुप थे नागरिक

अपनी गलियों से बेगाना हो गया था शहर
शहर में एक हाइवे था
जिस पर लिखी थीं हत्या और लूट की अनगिनत वारदातें

शहर के स्वागत में प्रवेश द्वार पर लगी विशाल विज्ञापन पट्टिकाएं
आत्म ग्लानि से भरकर उड़ गयीं उस रात
शहर के स्वप्न में

रात के डांस फ्लोर पर
बियर के झाग में नहायी थी रौशनी
आसमान के काउंटर पर धुत पड़ा था पूरा चांद
हवा के फ्रेम में पहले की तरह हिल रही थीं धर्मो की ध्वजाएं
टेलीविज़न की ब्रेकिंग न्यूज़ में बड़े आराम से घूम रहे थे अपराधी
और अपने चहरे की प्लास्टिक सर्जरी में व्यस्त था शहर का निज़ाम भी
हर कोई अपनी जगह सुखी और सुंदर था शहर में

कि तभी एक अनजान दिशा से गति के सारे रिकॉर्ड तोड़ता एक चमगादड़
शहर की सबसे ऊंची और चमकीली इमारत से टकरा गया
शहर की देह पर भरभराकर गिर पड़ा
उसके मस्तक का सबसे बड़ा मुकुट

एक लकड़बघ्घे की भयानक हंसी से डरकर
अपने रहस्यमय प्रदेशों में भाग गए जंगल के सारे पक्षी

देखते देखते एक मलबे में बदल गया शहर
अपाहिजों से भर गये अस्पताल
अपने परिजनों के इंतज़ार में
सड़ती रहीं लाशें
उच्च स्तरीय बैठकों में होने लगीं घोषणाएं

प्रेस कॉन्फ्रेंसों के होश उड़ गये थे
खून के धब्बों से भर गयी थीं कैमरों की फ्लैश लाइटें

हर ब्रेक के बाद
टीवी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था
शहर के इतिहास की सबसे बड़ी चीख का ग्राफिक्स

गुप्त मंत्राणाओं में उलझे थे पुलिस के आला अधिकारी
माइक्रोस्कोप और मैग्नीफाइंग ग्लास पर झुकी थी
शहर की सबसे बड़ी आंख

खंगाले जा रहे थे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज
इतिहास भाषा और संस्कृति की धुंध में ढ़ूढ़े जा रहे थे
शहर को बचाने के उपाय

चौराहों गलियों और उदास बस्तियों में
तेज़ हो गयीं सर्चलाइटें
शहर की सरहदों से खदेड़े जा रहे थे सभी अवांछित लोग
रेल्वे स्टेशनों पर ट्रेनों की प्रतीक्षा में हाँफ रहे थे वापसी के हज़ारों टिकिट
कि तभी

अपना फटा कोट पहनकर चलती ट्रेन से शहर के स्वप्न में कूद गया
एक थका हुआ मुसाफिर
उसे अब तक नहीं मिला अपना स्टेशन
जबकि उसकी क़मीज़ के कॉलर पर अब भी छपा था
शहर के सबसे पुराने दर्ज़ी का पता

समय की किसी मनहूस घड़ी में ऐसी हवा चली
कि उलट गये दिशा के कांटे
समय के पहले ही फट गया आसमान का वाटरबैग

महीनों मुसल्सल गिरती रही एक बदरंग बारिश
बारिश में घुल गयी एक मरे हुये पक्षी की अंतहीन पुकार

प्यास प्यास चिल्लाता एक झरना टूटकर गिरा पहाड़ी के उस पार
बाढ़ में बह गए सूखे पड़े खेत मवेशियों के चारागाह

अपने आसमानों से बिछड़कर शहर के स्वप्न में भटक गया एक समंदर
खाली खाली हवाओं में उड़ते रहे
प्यास की शिद्दत में डूब गए एक घोड़े के
उदास पंख

शहर की मुठ्ठियों से फिसलती रही
इंतज़ार की रेत
रेत पर तड़पकर मिट गया एक चंद्रमा का प्रतिबिंब
रेत पर घिसटती रह गयी एक मछुआरे की नाव
रेत पर औंध पड़ा रहा युद्ध् से लौटा एक विशाल जलपोत

वीरान हो गये बाज़ार
लाशों से भर गये क़ब्रस्तान और श्मशानघाट
चील की तरह मंडराता रहा शहर के गोश्त पर एक हैलीकोप्टर

भेस बदलकर
शहर में घुस आए गिद्धों के जत्थे के जत्थे
उदास मन से अपने वृक्षों के साथ शहर के स्वप्न में उड़ गये
चिड़ियों के घोंसले

धीरे धीरे एक स्वप्नविहीन मरुस्थल में बदलता गया शहर
शहर में बढ़ती गयी मशीनों की पैदावार
बढ़ता गया फैक्ट्रियों का आतंक

मिडिल क्लास मिडिल क्लास गाते गाते टूट गयीं खयालों की प्यालियां
और विचारों के जाम

इतिहास की पाठ्य पुस्तकों से ग़ायब हो गये शहर के सारे विवरण
वहां एक उजाड़ रेगिस्तान बचा था
जिस पर
एक मरीचिका के पीछे बेतहाशा भागते ऊंटों की लाशें बिछी थीं

रेत पर अचानक उभर आए थे
रेगिस्तान की आत्मा में कहीं गहरे दबे
शताब्दियों पहले लौट गये खोजी सौदागरों के पद-चिह्न

उधर जंगल की आदिम बस्तियों में
किसी भयानक अंदेशे की तरह घूम रही थीं
प्यास की हज़ारों किंवदंतियां

एक बूढ़े डांगर की तरह सांसे ले रहा था लोकतंत्र
अपनी पूंछ को खुरों पर मारता
उसकी पीठ पर बैठी थी अपनी उड़ानों से बेतरह निराश
एक सुनहरी चिड़िया

रौशनी की तलाश में धुंध को काटता एक लकड़हारा
बदहवास होकर गिर पड़ा शहर के स्वप्न में

अपने वक़्त के भयानक अँधेरे और खौफ़ से घबराकर
शहर के स्वप्न का दरवाज़ा पीटता रहा
सूरज का सातवां घोड़ा
शहर की शर्म के पसीने में डूबता यह उसका आखिरी दिन था

आने वाली सुब्ह की ग़ुमशुदगी से बेख़बर
ट्रैफ़िक सिग्नल पर इंतज़ार करते शहर की प्रतीक्षा में
अपनी अंतहीन गुफा का दरवाज़ा खोलकर
तैयार बैठी थी रात

शहर के स्वप्न को लेकर
एक घने जंगल की अजनबी गहराईयों में उतरती जा रही थी सुबह

शहर में तेज हो गयीं सायरनों की आवाज़ें
सक्रिय हो गए गुप्तचर
कि अचानक

यातायात के सभी नियम तोड़कर
शहर के स्वप्न की तलाश में अदृश्य हो गयी एक पीली टैक्सी

(दिलीप शाक्य)

साभार : वागर्थ, अक्टूबर २०१०
लिंक : http://www.bharatiyabhashaparishad.com/

16 अगस्त 2010

संजय की हज़ार हज़ार ऑंखें

यु़द्ध हो रहा है
धृतराष्ट्र के पास
संजय की हज़ार हज़ार ऑंखें हैं फिर भी

अनभिज्ञ है धृतराष्ट्र
यु़द्ध की ज़मीनी सूचनाओं से

क्या संजय की हज़ार हज़ार ऑंखें
गुमराह कर रहीं हैं धृतराष्ट्र को

या वे नहीं देख पा रहीं

अर्जुन और दुर्योधन  की तलवारों से
यु़द्ध-भूमि पर कटकर गिरी
हज़ार हज़ार बाहों को
हज़ार हज़ार घुटनों को
हज़ार हज़ार धड़ों को
हज़ार हज़ार सिरों को

ख़ून के दलदल में धॅंस रही है धरती
हवा पानी आग और आकाश हर कहीं
हो रहा है यु़द्ध

और अनभिज्ञ है धृतराष्ट्र
यु़द्ध की ज़मीनी सूचनाओं से

संजय की हज़ार हज़ार ऑंखों पर बंधी हैं
अंधेरे की हज़ार हज़ार पट्टियॉं

(दिलीप शाक्य)

15 अगस्त 2010

शहरयार की शायरी का शहर और हम

यह उन दिनों की बात है जब मैं झीलों के शहर भोपाल में साइकोलॉजी  आनर्स की पढ़ायी कर रहा था। वहॉं कुछ हमख़याल दोस्तों के साथ एक छोटी सा ‘ग्रुप’ बन गया था। हम सब तक़रीबन एक जैसे बैकग्राउंड से आये थे। हम उस मिडिल क्लास सिंड्रोम के शिकार थे जिसकी वजह से हजारों नौजवान अपने खुशहाल कस्बों को छोड़कर शहर के दिलफरेब कल्चर की ओर भाग रहे थे। यह भारत में लिबरलाइजेशन,प्राइविटायजेशन और ग्लोबलाइजेशन के शुरूआती दिन थे। हम सब कस्बों के स्कूल से पढ़कर आये थे। स्कूल की पढ़ायी हमारे लिये एक किस्म का ‘फ्रीडम स्ट्रगल’ थी क्योंकि उसी के बाद हमें अपने सपनों का ‘स्वराज’ मिलने वाला था। हमारे जेहनों में उस शहर का ख़ाका तैयार हो चुका था जिसे हमने अपने लिये कॉमिक्स की दुकानों पर बिकने वाले जासूसी नॉविलों,खराब क्वालिटी के सिनेमाघरों में लगने वाली फ़िल्मों, केबल टेलीविजन के जरिये प्राप्त हो रहे नित नये देशी-विदेशी टीवी कायक्रमों और रंगीन पत्रिकाओं के आकर्षक चित्रों में खोजा था। लेकिन हम जिस शहर में थे उसका नक्शा हमारे ख़्वाबों के शहर से मेल नहीं खाता था। फिर भी हमें शहर को देखकर घर याद नहीं आया,हम तो तमन्ना का दूसरा क़दम ढूढ़ रहे थे। हमने शहर में कुछ ठिकाने ढूढ़ निकाले थे जहां हम अक्सर मिला करते और अपनी बेचैनियां शेयर करते। इनमें एक पब्लिक लाइब्रेरी,एक कॉफी हाउस,एक छप्पर वाला चायघर,नाटकों के रिहर्सल के लिये मुफीद एक वीरान टीला और एक दोस्त का घर अहम थे। दोस्त की चश्मों की दुकान थी और उसे ग़ज़लें सुनने का बेइंतहां शौक़ था, इस क़दर कि उसके एक बेड का पूरा स्टोरेज ही ग़ज़लों के ऑडियो कैसेटों से भरा था। एक दिन उसने हमें एक इंपोर्टेड सी डी प्लेयर दिखाया जिसका कि हमने केवल नाम ही सुन रखा था। उस प्लेयर पर आशा की दिलकश आवाज़ में जो पहली ग़ज़ल हमने सुनी वो शहरयार की ग़जल थी-

                                         जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
                                         इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

इस ग़ज़ल को सुनते हुये हमें दो तरह के अहसास हुये। एक तो गालिब का वह मशहूर शेर ‘कुरेदते  हो जो अब राख जुस्तजू क्या है’ याद आया जिसे हमने ’मिर्ज़ा ग़ालिब’ नाम के टी वी सीरियल में जगजीत सिंह की आवाज़ में सुना था। दूसरा, ‘उमराव जान’ का वह सीन याद आया जिसमें फ़िल्म के आखि़र में उमराव फैजाबाद में अपने छूटे हुये घर की जानिब लौटकर आती है और साज़ पर यह ग़ज़ल बजती है-

                                        ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है
                                        हदे-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है

                                        बुला रहा है मुझे कौन चिलमनों के उस तरफ
                                        मेरे लिये भी क्या कोई उदास बेक़रार है

उमराव जान की तरह हमें भी चिलमनों के उस तरफ किसी उदास बेक़रार दुनिया की तलाश थी। यह तलाश हमें शहरयार और उर्दू के कुछ और मशहूर शायरों की तरफ ले गयी। उस वक्त तक उर्दू शायरी हमारे लिये आशिक और माशूक के रोमांटिक चक्कर से अधिक कुछ नहीं थी जिसमें बेचारे आशिकों को बहुत पापड़ बेलने पड़ते थे और माशूक मज़े में रहते। ये और बात है कि बाद के दिनों में अक्ल का दायरा कुछ और वसीय हुआ और कुछ उर्दू दां दोस्तों और कुछ लाइब्रेरियों की बदौलत उर्दू शायरी की बाक़ायदा रवायत का थोड़ा बहुत इल्म हासिल हो गया और आगे जाकर उसी इल्म की रौशनी में शहरयार के मजमुए ’ख़्वाब का दर बंद है’को कुछ और संजीदगी के साथ पढ़ा। .....ज़ल्द ही वह ग्रुप बिखर गया और नौकरी और अपनी जुस्तजू के शहर ढूढ़ते ढूढ़ते हम सचमुच के शहरों की जद्दोजहद भरी ज़िंदगी से दो चार हुये। तभी हमें शहरयार की शायरी में फैले शहर के असली मायने समझ में आये और इस तरह अपने ख्वाबों का शहर न ढ़ूढ़ पाने की हमारी मायूसी और शहरयार की शायरी में फैले शहर की खामोशी के दरम्यान एक ख़ास रिश्ता बन गया।

शहरयार की शायरी में मौज़ूद ‘शहर’  का एक सिरा ‘घर’  से बंधा हुआ है तो दूसरा सिरा ‘सहरा’ की सिम्त रवां है। उनकी शायरी में हमें एक ऐसा क़िरदार दिखाई देता है जो इन दोनों सिरों के दरम्यान एक लंबे सफर पर रवाना होना भूल गया है:

                                        एक एक करके सब रस्ते सुनसान हुये
                                        याद आया मैं लंबे सफर पे जाने वाला था

शहरयार की शायरी का क़िरदार ‘वह’ नहीं जिसे गालिब की शायरी में ‘दश्त’ की वीरानी देखकर ‘घर’ की वीरानी याद आती है, ‘वह’ तो ‘घर’ की वीरानी छोड़कर ‘शहर’ के नक्शे’ में भटकता है। उसे शाम होते ही शहर की तलब उठने लगती है-

                                         शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
                                         सोचता रोज़ हूं मैं घर से नहीं निकलूंगा

शहर उसके लिये एक पनाहगाह की तरह है लेकिन उसके पीछे अपनी मर्जी का घर न बना पाने की गहरी कसक है। इस कसक में अपनी ज़मीन से उखड़ जाने का दर्द भी साफ दिखाई देता है -

                                         घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती है
                                         अपने नक्शे के मुताबिक ये ज़मीं कुछ कम है‘‘

फिर एक दूसरे शेर में यह भी नामुमकिन लगता है-

                                          घर की तामीर तसव्वुर में भी नामुमकिन है
                                          दिल ने नक्शा ही बना रखा है घर का ऐसा‘‘

घर के इस नक्शे की तामीर जिस जगह मुमकिन है क्या वह जगह ‘सहरा’ है क्यों कि वहां से शायर के किरदार को बुलावे आते हैं और क्या पता वहां नक्शे के मुताबिक जमीं भी कम न हो

                                         आओ बैठो कुछ करें सहरा की जानिब चलें
                                         बैठे बैठे थक गये साये में दीवार के

                                         फिर बुलाया है हमें दश्ते-फरामोशी ने
                                         कोई आमादा है क्या साथ में चलने के लिये

                                         चलो जंगलों की तरफ फिर चलो
                                         बुलाते हैं फिर लोग बिछड़े हुये

साफ है कि शहर की अजनबियत में शायर घर के पुराने ख्वाब को भूला नहीं है। इसलिये वह सहरा की तरफ तन्हा नहीं जाना चाहता। लेकिन यह भी एक आयरनी है कि घर की तामीर की तरह सहरा का सफर भी आसान कहां? शहर की ज़ंजीर से वह इस क़दर बंधा है कि निज़ात मुमकिन नहीं।

                                        चाहा था कि दश्त को गुलजार कर सकूं
                                        मेरे बदन में खून तो था इतना खूं न था’’

                                        मुझको रहना था इसी शहर की गलियों में असीर
                                        मेरे हिस्से में कहां दश्त की पहनाई थी

शायर के इस अहसास में हर वह आदमी शरीक है जो अपने हिस्से के शहर को पूरी निस्बत और बेगानगी के साथ जीता है। शहरयार ऐसे आदमी के लिये शहर को एक डिफेंस मैकेनिज़्म के रूप में देखते हैं और दश्त के तमाम बुलावों के बावज़ूद शहर उनके लिये एक सुरक्षित पनाहगाह है:

                                        शहर फिर शहर है यां जी तो बहल जाता है
                                        शहर को छोड़कर सहरा में न जा मान भी जा’’

शहरयार की शायरी में शहर की जो तस्वीर उभरती है वह हमें अंदर तक बेक़रार कर जाती है। इस तस्वीर में ओस से भींगी हुयी रातें ही नहीं हैं तपते हुये रेत का सहरा भी है। समंदर से प्यासे लौटने का दर्द है तो दरिया के सामने तिश्नालब रह जाने का मलाल भी है। यह शहर एक नीमख़्वाब रात में जागता शहर है। ऐसा लगता है कि शहरयार का क़िरदार घर से निकाला हुआ है और जिसकी मंज़िल दश्त में है लेकिन मंज़िल से पहले ही वह शहर में भटक गया है:

                                        दश्त में पहुंचे  न घर में आये
                                        किन बलाओं के असर में आये

शहर की इन ‘बलाओं’ में नींद नहीं। ग़ालिब ने इन्हीं शहरों के लिये कहा होगा ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’। यह शिक़ायत शहरयार की भी है

                                         नींद की ओस से पलकों को भिगोयें कैसे
                                         जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे

ऐसे ही शहर की ज़िंदगी का एक खास टोन हमें उस ग़ज़ल में दिखायी दिया जिसे हम तक सुरेश वाडेकर की आवाज़ ने पहुंचाया-

                                         सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यूँ  है
                                         इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ   है

शहर में बसने वाले ये परेशान लोग अपनी पहचान खो चुके लोग हैं। शहर में इंसान के इंसान से अजनबी हो जाने के दर्द को शहरयार जिस इंटेसिटी और बावस्तगी के साथ बयान करते हैं वह बाज शायरों के यहां कम ही देखने को मिलता है-

                                         वो कौन था वो कहां का था क्या हुआ था उसे
                                         सुना है आज कोई शख्स मर गया यारो

शहरयार की शायरी दरअसल एक आर्टिस्ट तख्लीककार की शायरी है। उनके यहां कुछ ख़ास तरह के रंग, रंगों के स्ट्रोक्स, आकृतियां, छवियां और कुछ ख़ास आवाज़ें हैं जो अपने साथ इंसान की वज़ूदियत और उसकी जिंसी कैफियत को अनेक पुराने और नये सवालों के साथ हमारे रूबरू लाती है। उनकी शायरी के क़िरदार का ‘मैं’निखालिस ‘इंडिविजुयल’ दिखते हुये भी अपने प्रोग्रेसिव सरोकारों से मुंह नहीं मोड़ता। वह अपने दर्द में सबके दर्द को समो लेने की कुव्वत रखता है-

                                    सबका अहवाल वही है जो हमारा है आज
                                    ये अलग बात है शिकवा किया तन्हा हमने


(दिलीप शाक्य)
 

13 अगस्त 2010

सीली हुयी माचिस और डूबते सूरज की याद

जैसे ही धूप में रखी
मैंने अपनी सीली हुयी माचिस
रास्ते में आ गये बादल
बादलों में डूब गया सूरज

अंधकार

अंधकार से सजधर  कर निकली
लाइटरों की एक जगमगाती दुकान
एक लाइटर इतना आकर्षक था
कि मैंने उसे ख़रीद लिया

फिर बरस बीते

घर की चाबियों की तरह
लाइटर भी पुराना पड़ गया

लेकिन सिगरेट के धुंए में अब भी ताज़ा है
सीली हुयी माचिस और डूबते सूरज की याद

हालांकि यह धुआं भी अब पुराना पड़ गया है
इतना पुराना
कि अक्सर सोचता रहता हूँ
इससे छूटने की आसान तरकीबें

(दिलीप शाक्य)

9 अगस्त 2010

दहक

मेरी और तुम्हारी आंख का पानी
बन सकता है सीने की आग
ज़रा सोचो

आओ बैठो
इस बुझी हुयी राख में कुरेदें
फिर किसी ख़्वाब की दहक
तो क्या हुआ कि गूंगे हैं
चीखें फिर भी लगाकर ज़ोर

क्या पता दरक ही जाए
यह आलीशान कांच की दीवार

(दिलीप शाक्य)

3 अगस्त 2010

घुड़सवारी

रात के गहरे अंधकार को चीरकर
समुद्र की लहरों से निकल रहा है एक घोड़ा

घोड़े के इंतज़ार में
समुद्र के किनारे खड़ा है एक सिरफिरा सवार
हाथों में थामे लगाम और रक़ाब
घोड़े की ज़बान पर चिपका है
आने वाले दिनों की अजनबी यात्राओं का स्वाद

शहर में हिनहिनाता घूम रहा है एक घोड़ा
अपने सवार के दस्तानों और जूतों की तलाश में
तितर बितर हो रही है भीड़
भीड़ में अदृश्य हो गया है एक घोड़ा
छोड़कर अपनी लगाम और रकाब

एक घोड़े के नायाब करतबों की तारी़फ में
बांधे जा रहे हैं कुछ ख़ूबसूरत पुल
पुलों पर चढ़े कुछ टेलिस्कोप
नीचे बह रही एक अनदेखी नदी का
अविस्मरणीय गीत गा रहे हैं
नदी की तलाश में
वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा
प्यासा ही लौट रहा है
उसकी आखों में झूल रही है
पुलों के नीचे चमक और शोर के अनंत में डूबी
कंक्रीट की एक लंबी सड़क

( दिलीप शाक्य )

1 अगस्त 2010

नावें

कितनी नमी थी इबारत में
पढ़ते ही भीग गयीं ऑंखें

ऑंखों में फैल गयी झील एक
चल निकलीं यादों की नावें

पानी में पॉंव डाल
बैठा रहा समय किनारे

शाम हुयी खुल गयीं
परिंदों की पॉंखें

नावों से उतरे मुसाफिर
दूर कही खो गये

(दिलीप शाक्य)

30 जुलाई 2010

महाप्रलय के बाद

समय के दलदल में
डूबता है सभ्यता का जंग लगा पहिया

किनारे खड़ा रोबोट
देखता है चुपचाप निर्विकार

खला में तैरती हैं
पक्षियों के टूटे हुये पंखों की उदास छायाएं

सन्नाटा टूटता है
दलदल के तल से उभरती हैं सहसा
छिपे हुये झींगुरों की असंख्य आवाज़ें

क्षितिज पर फूटती हैं रौशनी की किरणें

लौटती हैं पंखों की उदास छायाएं
लौटता है रोबोट
लौटता है सभ्यता का जंग लगा पहिया

(दिलीप शाक्य)

हमारी आग

ये किसके जासूस
छिपकर बैठ गये हैं
हमारे बैठने खाने और सोने के कमरों में

कि हमारी नींद तक से चली गयी है
हमारे दालानों बरामदों और खलियानों की धूप

हमारे पैरों से
खिसकती जा रही है हमारी धरती
हमारी हवा हमारा आकाश हमारा पानी
हमसे हो रहा है दूर लगातार

हमसे छीनकर हमारी आग
किसने रख ली है अपने रेफ्रीजिरेटेड गोदामों में
कि हमारी आत्मा तक में भर गयी है सीलन
अँधेरे में डूब रही है विरोध् में तनी मांसपेशियों की चमक

उठो शिराओं में उबलने दो ख़ून का मिजा़ज
उठो खुलने दो तालू से चिपकी हुयी ज़बान
उठो कि इस बार हम सब मिलकर
छुड़ा लाएं हमारी आग

कि हमारी दुनिया को बहुत तेज़ ज़रूरत है
रौशनी की

(दिलीप शाक्य)

6 मार्च 2010

क़त्ल

एक चाकू की दस्तक से
टूटकर बिखर गया
हिज्र की अंधेरी रात में
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख्वाब

होटल के कमरे की अलसायी रौशनी में
ख़ून के ध्ब्बों से भर गयी
मोनालिसा की पवित्र मुस्कान

किसी क्लियोपेट्रा के पोलडांस पर उत्तेजित
इस कविता की अंधेरी रात के नायक को
और भी उन्माद से भर गया
वस्ल की चांदनी के क़त्ल का समाचार

जबकि एक अनंत अवसाद में डूबता गया
चाकू का समूचा वज़ूद

कविता की अंधेरी रात से निकलकर
चाकू की नोक पर आ बैठा था
वस्ल की चांदनी का रुपहला ख़्वाब
अपने विशाल पंख फैलाए
~ दिलीप शाक्य

21 फ़रवरी 2010

देह-भाषा

उसकी देह
उसकी भाषा को रौंदकर आगे निकल आयी

टूटकर बिखर गया
उसके लिबास का कसा हुआ वाक्य
छिटक कर दूर जा गिरे नींद में हँसते हुए शब्द

इससे पहले कि संभलता मेरी लिपि का व्याकरण

तालू से चिपकते गए वर्ण
गले में रुन्धती गयीं ध्वनियाँ
होश की तरह छूट गयी सांसों से वर्तनी

आँखों में पिघलता रहा कोई मधुवन
रोम रोम में समा गयी गंध

(दिलीप शाक्य)

13 नवंबर 2009

सुकवि का स्वप्न

नींद के घोड़े पर सवार

किसी स्वप्न की तलाश में

जाने को था सुकवि

कि

बिजली चमकी बादल गरजे

आकाशवाणी

‘मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते !’

(दिलीप शाक्य)