20 जुलाई 2014

तारकोवस्की का कथन और हमारे सिने-दर्शक [पाँचवी किश्त ]

जलसाघर 
Column by dilip shakya on Cinema/Art [मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी]

             


गांवों क़स्बों और जनपदों से
रेलों, मोटरों और लारियों में भरकर खिंचे आ रहे थे
मेलों, गीतों और लोककथाओं की दुनिया के हज़ारों क़िरदार

सिनेमा की दुनिया में ऐसे खोए
कि भूल गए अपने ही पैरों के निशान
उनकी हथेलियों से ग़ायब हो गयीं भविष्य की रेखाएं
हू-ब-हू एक जैसे हो गये  सबके अंगूठों के  हस्ताक्षर

सिनेमा देखते क़िरदार और फिल्म के बीच सरकते रहे
उनकी अपनी ज़िंदगी के अनगिनत अनसुलझे रहस्य बिंब और आख्यान
जबकि फिल्म की रील में नहीं था उनके सपनों का एक भी नेगेटिव
[अंश, शहर के स्वप्न में] 

यह कवितांश हमें सिनेमा देखने के उस ख़ास अनुभव की ओर ले जाता है जो अब तक़रीबन समाप्तप्राय अवस्था में पहुंच रहा है। धूल भरे क़स्बों और जनपदों के सिनेमाघरों की हैसियत किसी पुरानी हवेली या डाक-बंगले की इमारत से कम नहीं होती थी। जिस प्रकार हवेलियों और डाक-बंगलों से निकलकर अनेक झूटी-सच्ची कहानियां लोक में समा जाती थीं उसी प्रकार सिनेमाघर भी अनेक कहानियों के जन्म लेने और मिट जाने के गवाह रहते आए थे। वे सामूहिक मनोरंजन के नए केन्द्र थे। मध्यवर्गीय जीवन की रोमानी बिडम्बनाओं, नॉस्टेल्जिक भावनाओं और किशोर कल्पनाओं की उत्तेजनाओं से भरे। यदि किसी सिनेमाघर को विटनेस-बॉक्स में बुलाकर पूछा जाए तो ऐसी अनेक मनोहर कहानियों के सफ़े खुलने लगेंगे जो किसी भी समाज की सुविधाजनक छवि को एक ही समय पर चमकाने और धूमिल करने के लिए पर्याप्त होंगे।

बरिश में भीगते फ़िल्मी पोस्टर और नए दौर के डिजिटल डिस्पले
महानगर की घनघोर बारिश। मल्टीप्लैक्स। मैटिनी शो का इंतज़ार। फ़िल्म के विशाल डिजिटल डिस्पले। मल्टीप्लैक्स के अंदर आते ही बारिश की नमी जाती रही। पुरानी काट के सिनेमाघर की स्मृति लौट आयी। मूसलाधार बारिश में छाता संभाले प्रेमी युगल टिकिट खिड़की पर। फ़िल्म के रंगीन पोस्टर में तिरछी बूंदों से भीगते मनोज कुमार और साधना के चेहरे। बारिश से इस तरह धुल गए थे मानो कैमरे ने फिल्टर बदल लिया हो। सिनेमाघर के रुपहले पर्दे पर जैसे ही चेहरे पर जु़ल्फों के महीन रेशे बिखेरे अभिनेत्री साधना ने गाना शुरू किया ‘रिम झिम रिम झिम नैना बरसे पिया तेरे मिलन की आस’.... सिनेमाघर की छत ओलों से गड़गड़ाने लगी। यह एक विचित्र अनुभव था। दोपहर का समय, बारिश की आवाज़ और 60 के दशक की मशहूर फ़िल्म ‘वो कौन थी’ का गहराता रहस्य। इन्टरवल के दौरान फिर उसी पोस्टर को देखा। सारे रंग धुलकर एक फीकी नीलाई में समा गए थे। पोस्टर का एक कोना उखड़कर हवा से बार-बार हिल रहा था। स्मृति वापस लौटी। स्मृति की भीनी भीनी गंध से खाली नए दौर के डिजिटल डिस्पले पर एक उड़ती निगाह डालकर हम मल्टीप्लैक्स के मैटिनी शो में बैठ गए। 

तीन घंटे के अंधेरे में तैरता स्वप्निल उजाला 
स्कूल और कॉलेज के दिनों में परीक्षा केन्द्र और सिनेमाघर ज़्यादातर लड़के-लड़कियों के जीवन में एक विशेष आकर्षण का मक़ाम रखते थे। दोनों में ही तीन घंटे की समयावधि का रोमांच बांधे रखता है। फ़र्क यही है कि सिनेमा की तरह परीक्षा में कोई इन्टरवल नहीं होता और एक ही परीक्षा को आप बार-बार नहीं दे सकते। सिनेमा देखते हुए प्रायः सभी स्थायी भावों से रसों की उत्पत्ति होती है जो प्रायः सुखद प्रतीत होती है किन्तु परीक्षा देते समय केवल एक ही स्थायी भाव जागृत रहता है वह है भय, जिसकी परिणति सुखद भी हो सकती है और दुखद भी। लेकिन परीक्षाओं का एक अच्छा पहलूू यह भी था कि उसके बाद छुट्टियां हो जाती थीं और सिनेमा देखने की खुली छूट मिल जाती थी। स्कूल-कॉलेज और सिनेमा की यह लघुकथा उस परिवेश की लघुकथा है जो आज की तरह गूगल सर्च, यू-ट्यूब वीडियो और विकीपीडिया जैसे क्रांतिकारी ज्ञान-माध्यमों से खचाखच नहीं था। आज यू-ट्यूब जैसी वैबसाइटों ने सिनेमा-दर्शन की दुनिया में ऐसा कारनामा कर दिखाया है कि नयी से नयी और पुरानी से पुरानी फ़िल्म आप कितने ही इन्टरवल्स के साथ कितनी ही बार देख सकते हैं और वह भी न्यूनतम खर्चे में। बड़े शहरों में नयी पीढ़ी के दर्शक शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स़ का सिनेमा देख रहे हैं तो छोटे शहरों के दर्शक टीवी-डीवीडी आदि के ज़रिये पाइरेटेड सीडी के बाज़ार की ओर मुड़ गए हैं या फिर टीवी चैनलों के अतिशय मनोरंजन में फंस गए हैं। हर हालत में सिंगल स्क्रीन थिएटर कहे जाने वाले सिनेमाघर या तो बंद हो चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं।

इस तरह के सिनेमाघरों में पहुंचे दर्शक अंधेरे और उजाले के एक अद्भुत मौन संवाद के बीच बैठे रहते हैं। पर्दे का उजाला हमारी ही ज़िदंगी के अनेक अंधेरे पक्षों का आकर्षक छायांकन है। यह उजाला तीन घंटे की नींद में देखे गए किसी स्वप्न सरीखा आभास देकर जाता है। उजाले के स्वप्न में चल रहे कौन से क़िरदार हक़ीक़त के अंधेरे में बैठे दर्शकों की चेतना में प्रवेश कर जाते हैं, इसकी हर दर्शक की एक अलग छुपी हुई कहानी है। दर्शक के लिए फ़िल्म देखना सामूहिक चेतना के अंधेरे में अपनी व्यक्तिगत कामनाओं को पा लेने का एक अस्थाई और आभासी प्रयास भर है। वह जानता है कि तीन घंटे के बाद उसे वापस अपनी रोज़मर्रा की कटु तिक्त सच्चाईयों में लौट जाना है। 

किताब में बदलता सिनेमा
जब भी आप किसी महानगर से किसी क़स्बे की ओर वाया ट्रेन सफ़र करेंगे, स्वयं को स्त्री की अनेक छवियों से घिरा हुआ पाएंगे। महानगर के रेल्वे स्टेशनों पर पाश्चात्य परिधानों वाली जो स्त्रियां गहरे आत्मविश्वास और खुलेपन से भरी दीखती हैं वही कस्बों के रेल्वे स्टेशनों पर एक ख़ास किस्म के संकोच और दबे-छुपेपन में सिमटी होती हैं। इनमें से अधिकांश छवियां हिन्दी सिनेमा की दो विभिन्न प्रकार की नायिका छवियों कोे सामने लाती हैं। क़स्बों के रेल्वेस्टेशन की स्त्री-छवि संयुक्त परिवारों की सामूहिकता की स्मृति को जगाती है और महानगर के रेल्वेस्टेशन की स्त्री-छवि एकल परिवारों की वैयक्तिकता को प्रतिबिम्बित करती है। स्त्री की मुखरता ने संयुक्त परिवारों की सामूहिकता से निकलकर एकल परिवारों की वैयक्तिकता में क़दम रख दिया है।

हमारे सिनेमा में प्रतिबिम्बित एकल परिवारों के बढ़ते चलन और स्त्रियों की इस मुखरता में एक गहरा सम्बंध है। अगर ध्यान से देखें तो 1994 की फ़िल्म ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद संयुक्त परिवार की प्रतिष्ठा का गुणगान करने वाली कोई अन्य सफल फिल्म नहीं दिखाई देती। उदारीकरण के बाद के सिनेमा की कहानियां कमोबेश एकल परिवारों की ही कहानियां हैं। ये कहानियां समाज में सामूहिक अनुभव से वैयक्तिक अनुभव की दिशा में निरंतर अग्रसर होती कहानियां है। यही बात भारतीय सिनेमा के दर्शकों के बारे में कही जा सकती है। वे सिनेमाघरों की सामूहिकता से निकलकर होम थियेटर की वैयक्तिकता में चले आए हैं। हर कहीं उपलब्ध फ़िल्म-सीडी और यू-ट्यूब वीडियो ने भारतीय सिने दर्शक को पाठक और फ़िल्म को किताब में बदल दिया है। कहने का अर्थ यह है कि अब आप किसी फ़िल्म को किताब की तरह पढ़ सकते हैं, वो भी नितांत अकेले, और चाहें तो क़िश्तों में। इस नए दर्शक के लिए तीन घंटे की समयावधि की अनिवार्यता का कोई अर्थ नहीं है। यही वह तर्क है जो फ़िल्म की पारंपरिक कथा संरचना ‘आरंभ, मध्य और अंत’ की धारणा को खंडित कर देता है। यानि फ़िल्म की लम्बाई कुछ भी हो नया दर्शक अपने इंचीटेप के मुताबिक ही फ़िल्म की लम्बार्इ्र तय करेगा। अब यही काम कुछ फ़िल्म-निर्देशकों ने भी शुरू किया है। दो भागों में निर्मित अनुराग कश्यप की फ़िल्म ‘गैैंग्स ऑफ वासेपुर’ इस इंचीटेप का एक उम्दा उदाहरण है।

तारकोवस्की का कथन और हमारे सिने-दर्शक
मशहूर रूसी फ़िल्मकार आन्द्रेई तारकोवस्की ने अपनी आत्मकथात्मक फ़िल्म ‘मिरर’ पर एक मज़ेदार टिप्पण्पी की है-

‘‘कोई दर्शक किसी फ़िल्म की विषयवस्तु से जितना अधिक दूर होता है, उतना ही वह सिनेमा के अधिक निकट होता है। सिनेमा में लोग अपनी ज़िंदगी की धारावाहिकता खोजते हैं न कि बदलावों को।’’

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारे दर्शकों के साथ इसका उल्टा होता है। सौ में से नब्बे दर्शक विषय-वस्तु और दोहराव का सिनेमा देखते हैं। शायद यही वजह है कि पाइरेटेड फ़िल्मों का सबसे बड़ा बाज़ार भारत ही है। जिस सिने-बिम्ब को एक फ़िल्म-निर्देशक अपनी कल्पनाशीलता और श्रम से तैयार करता है, हम उसे एक चलताउ निगाह से देखकर आगे बढ़ जाते हैं। भारतीय दर्शक के इस ख़राब जीवनबोध और सौन्दर्यबोध के कारण बड़े बड़े प्रतिभाशाली निर्देशकों को बॉक्स ऑफिस की खिड़कियां नसीब नहीं होती और दर्शकों का सौन्दर्यबोध बिगाड़ने वाले मामूली प्रतिभा के निर्देशक करोड़ों कमाकर हमेशा बाज़ार में बने रहते हैं। गीतकार शैलेन्द्र द्वारा निर्मित और बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित फ़िल्म तीसरी क़सम का बॉक्स ऑफिस पर न ठहर पाना इस स्थिति का सटीक उदाहरण है, जबकि यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की एक अद्भुत फ़िल्म है। यही क्यों सत्यजीत रे, रित्विक घटक, मृणाल सेन आदि की परम्परा में विकसित अनेक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो फ़िल्म महोत्सवों की तो जानी मानी हस्तियां हैं किन्तु एक आम मध्यवर्गीय दर्शक ने बमुश्किल ही इनके नाम सुने होंगे। हमारे समाज में सिनेमा देखने के तौर-तरीकों का अध्ययन किया जाए तो बड़े दिलचस्प नतीज़े सामने आएंगे। प्रायः यह धारणा है कि दर्शक सिर्फ़ फेयरीटेल, फैंटेसी या सनसनी पैदा करने वाला सिनेमा देखना चाहता है। सिनेमा उसके लिए सिर्फ़ मनोरंजन है। जिन रोज़मर्रा की मुश्किलों से वह दो चार होता है उन्हें सिनेमा में बर्दाश्त नहीं करना चाहता। अनेक फ़िल्मकारों ने भारतीय सिने-दर्शक को उस रास्ते पर ले जाने की कोशिश की जो तारकोवस्की के कथन से निकलता है। देखना चाहिए कि आज के संदर्भ में तारकोवस्की के कथन का प्रतिनिधित्व करने वाले कितने निर्देशक और दर्शक हमारे समाज में हैं। 
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