6 जून 2014

हिन्दी सिनेमा का साड़ी-प्रसंग [चौथी किश्त]

जलसाघर 

Column by dilip shakya on Cinema/Art [मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी]




दादा साहब फालके निर्मित भारतीय सिनेमा की पहली फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र में फ़िल्म की नायिका तारामती का परिधान साड़ी है किन्तु यह दिलचस्प तथ्य है कि पत्रिका इन्द्रप्रकाश के मई 1912 के अंक में विज्ञापन देने के बाद भी फ़िल्म की नायिका नहीं मिली, तो फिर यह साड़ी एक पुरुष अभिनेता अन्ना सालुन्के ने पहनी, जो एक होटल में बावर्ची थे। फ़िल्म के निर्दशक फालके की ही तरह तारामती का अभिनय करने वाले सालुन्के महाराष्ट्रियन थे और उन्होंने जो साड़ी फ़िल्म में पहनी वह भी महाराष्ट्रियन थी। महाराष्ट्रियन साड़ी आज के दौर की स्त्री अभिनेत्रियों ने भी पहनी है किन्तु फालके की फ़िल्म में वह नायिका का परिधान था जबकि आज की फ़िल्मों में अधिकतर उसे आइटम सोंग सीक्वेंसेज़ के लिए इस्तेमाल किया गया है। यूं तो राजकपूर की फ़िल्म बॉबी के गीत झूट बोले कौआ काटे की महाराष्ट्रियन साड़ी में डिम्पल कपाड़िया ने शानदार नृत्य किया है किन्तु 1990 की फ़िल्म सैलाब के गीत ‘हमको आजकल है इन्तज़ार’ में माधुरी दीक्षित ने जिस उत्तेजना और सौम्यता के साथ वह साड़ी नृत्य किया था, वह आज के दौर की फ़िल्म अग्निपथ के चिकनी चमेली वाले कैटरीना नृत्य को बहुत पीछे छोड़ देता है।

यंूू देखा जाए तो हिन्दी के मुख्यधारा सिनेमा में ज़्यादातर साड़ियां उत्तर भारतीय पैटर्न की रही आयी हैं। ऐसा शायद इसलिए रहा कि 90 के दशक के उत्तरार्द्ध तक हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा बाज़ार उत्तर भारत के गांवों, क़स्बों और शहरों से बनता था। मधुबाला, बैजन्तीमाला, नूतन, आशा पारेख, नन्दा और मुमताज जैसी अभिनेत्रियों ने 60 और 70 के दशक में साड़ी की लोकप्रियता को बहुत रौनक बख़्शी। 80 के दशक में रेखा, श्रीदेवी, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल के स्त्री चरित्रों ने साड़ी को मध्यवर्गीय स्त्री के परिधान के रूप में पेश किया। 90 के दशक में दृश्य बदलता है और स्त्री चरित्रों के परिधानों में जीन्स टॉप और स्कर्ट का अनुपात बढ़ने लगता है फिर भी माधुरी दीक्षित उस दौर की शायद एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थीं जो ‘हम आपके हैं कौन’ फ़िल्म की रिलीज़ के बाद एक मुकम्मल साड़ी-बिम्ब में बदल चुकी थीं। छोटे शहरों के वस्त्र विक्रेताओं की दुकानों पर आज भी इन अभिनेत्रियों के साड़ी-चित्र देखने को मिल जाएंगे। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में शाहरुख़ और काजोल अभिनीत ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंेगे’ से फ़िल्म-उद्योग में ओवरसीज़ सिनेमा का नया बाज़ार खुला और फ़िल्मों के विषय छोटे शहरों और क़स्बों से निकलकर दिल्ली, मुंबई और योरप, अमेरिका के दर्शकों की रुचि-अरुचि को ध्यान में रखकर तय होने लगे और आजकल तो फ़िल्मों में गांव और क़स्बों के दृश्य केवल सैर-सपाटे के लिए रह गए हैं। वे फ़िल्मों की आंतरिक संरचना का हिस्सा नहीं हैं। यही वजह है कि हाशिए के समाजों में जी रहा दर्शक इस नए ढंग की फ़िल्म संस्कृति से स्वयं को अलग-थलग महसूस करता है।

इतिहास की तरफ़ देखें तो भारतीय समाज में साड़ी का प्रचलन सिंधु-घाटी सभ्यता के आरंभ से ही रहा है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेषों में जिस धर्मोपदेशक का उल्लेख मिलता है उसके वक्ष पर साड़ी के जैसा ही कोई वस्त्र लिपटा दिखाई देता है। कालान्तर में बौद्धकालीन समाज में स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले ‘सात्तिका’ नाम के परिधान का उल्लेख मिलता है। ‘सात्तिका’ प्राकृत भाषा का शब्द है जो बिगड़ते-बिगड़ते पहले ‘साती’ हुआ फिर ‘साड़ी’ हो गया। महाभारत में द्रौपदी के चीर-हरण प्रसंग में भी जिस वस्त्र का उल्लेख है उसे साड़ी के रूप में देखा गया है। पुराणकालीन विवरणों में भी विभिन्न देवियों और देव-पत्नियों का परिधान भी साड़ी ही है। इस प्रकार साड़ी प्रायः भारतीय नारी को एक संस्कृति-प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती रही है। प्रसिद्ध श्लोक ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवताः’ में भी शायद साड़ी वाली स्त्री से ही आशय है।

अंग्रेजी आधुनिकता और भारतीय नवजागरण के दौर में नारी के इस सांस्कृतिक प्रतीक पर अतिशय बल दिया गया था, जिसकी ख़िलाफत भी उस दौर की अनेक स्त्री चिंतकों एवं पुरुष विचारकों ने की थी। बाद के वक़्तों में कई भारतीय सिने-निर्देशक भी इन विचारों से प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी फ़िल्मों में स्त्री अभिनेताओं को केन्द्रीय महत्व देना आरंभ किया। अभिनेता के बरक़्स अभिनेत्री शब्द अस्तित्व में आया और नायक के बरक़्स नायिका। विमल राय ने एक ओर सुजाता जैसी अछूत स्त्री-नायिका के प्रेम की कहानी कही तो दूसरी ओर देवदास के ज़रिए बंगाली भद्र लोक में पारो और चन्द्रमुखी के चरित्र को नायिकत्व प्रदान किया।

विमल राय ने स्त्री के चरित्र को जिस सामाजिक परिवर्तन के बहाव में देखा था, उसे राजकपूर ने एक नयी परम्परा का वाहक बना दिया। राजकपूर की फ़िल्मों के प्लॉट तो सामाजिक होते थे किंतु उनमें नायिका की छविे से प्रायः रोमान्स जनरेट करने का ही काम लिया गया। फ़िल्म में स्त्री, नायिका भी होती थी और उसकी उपस्थिति भी केन्द्रीय होती थी किंतु राजकपूर ने स्टीयरिंग व्हील सदैव नायक के हाथों में रखा। उनकी फ़िल्में देखते हुए चित्रकार राजा रवि वर्मा की याद आती है जिनके स्त्री-बिम्ब देखने में अत्यंत संस्कारी लगते हैं लेकिन उनके भीतर से एक प्रकार की कामुक मांसलता झलकती रहती है। राजकपूर की फ़िल्मों की नायिकाएं भी प्रायः ऐसी ही हैं। ऐसा लगता है कि राजकपूर में साड़ी के प्रति एक प्रकार का ऑब्सेशन है। यह ऑब्सेसन इस हद तक था कि फ़िल्म ‘संगम’ तो में उन्होंने वैजन्तीमाला को हर दृश्य में एक नए काट की सफ़द साड़ी पहनायी। साड़ी को उन्होंने एक ऐसे सांस्कृतिक आवरण के रूप में अपनाया जिसमें से स्त्री की अस्मिता, कामुकता, और ऐन्द्रीयता का मिला-जुला रूप पूरे तेज के साथ दर्शक के समक्ष प्रतिबिम्बित होता रहे। इसी फ़िल्म में एक गाना है ‘क्या करुं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’। इस गाने में फ़िल्म की नायिका ने एक विदेशी होटल में भारतीय साड़ी के रूपक में छुपे अनेक पाश्चात्य परिधान पहनकर नायक का मनोरंजन किया है जो उस दौर के पितृसत्तात्मक पुरुष की स्त्री-कामना का परिचायक है। इसी प्रकार फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में अभिनेत्री पद्मिनी रामचन्द्रन पर फिल्माया गाना ‘मोरे अंग लग जा बालमा’ भारतीय स्त्री देह का कामोद्दीपक एवं कलात्मक प्रस्तुतिकरण है। उनकी ‘फ़िल्म सत्यम शिवम सुन्दरम’ भी एक ऐसी स्त्री-नायिका की कथा है जिसका आधा चेहरा जला हुआ है, किन्तु राजकपूर चेहरे के समस्त सौंदर्य को जी़नत अमान की देह-यष्टि में उतार देते हैं और दर्शक को बांधे रखने में क़ामयाब लगते हैं। ‘राम तेरी गंगा मैली’ में सिर्फ़ एक झीनी सफ़ेद साड़ी में नायिका मंदाकिनी पर फ़िल्माया वर्षा-दृश्य तो किसी न्यूड-पेन्टिंग सा ही है।

राजकपूर की फ़िल्में जहां इस प्रकार की मध्यवर्गीय स्त्री-छवि की रचना कर रही थीं वहीं, उसी दौर के निर्देशक महबूब ख़ान ने फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ जैसी फ़िल्म बनायी जिसकी साड़ी उस स्त्री-बिम्ब की कथा कहती है जिसमें एक किसान स्त्री अपनी अदम्य जीजीविषा, अपने आत्म-संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति अपनी चेतना को स्थापित करती है। राजकपूर और महबूब ख़ान के समानांतर एक और सिनेमा था जिसे सत्यजीत रे, मणि कौल, रित्विक घटक, श्याम बेनेगल और बासु भट्टाचार्य जैसे प्रतिभाशाली निर्देशकों ने बेहद कठिन जीवन-स्थितियों के बीच विकसित किया था। इन निर्देशकों ने शर्मिला टैगोर, शबानी आज़मी, स्मिता पाटिल आदि के रूप में एक अलग समाज और समुदाय की स्त्रियों को नायिकाओं के रूप में पेश किया जो मामूली साड़ियां पहनती हैं किन्तु जिन्हें फ़िल्म में एक ताकतवर यथार्थवादी स्त्री-बिम्ब के रूप में उभरता हुआ दिखाया गया है। पिछले 5-10 वर्षों में अनेक ऐसी फ़िल्में आयीं है जिनमें इन फिल्मकारों के स्त्री सरोकारों को फिर से प्रस्तुत करने की कोशिशे की जा रही हैं। एकदम नये निर्दशक सौमिक सेन की फ़िल्म गुलाब गैंग एक ऐसा ही कारनामा है जिसे आज के मेट्रोपोलिस दौर में सिर्फ एक गुलाबी साड़ी के सहारे संभव किया गया है। गुलाब गैंग की गुलाबी साड़ी नए समाज में स्त्री के प्रतिरोध का सबसे ज़िन्दा प्रतीक है। माधुरी दीक्षित अभिनीत इस फ़िल्म को देखकर प्रकाश झा की मृत्युदंड का वह दुश्य बरबस याद हो आता है जिसमें साड़ी पहने माधुरी दीक्षित के हाथों में गुलाब नहीं बन्दूक है। वस्तुतः यह दृश्य ‘मदर इंडिया’ के अंतिम दृश्य में बन्दूक फायर करती नायिका नरगिस की स्त्री-छवि का ही छाया अनुवाद है।

दिलीप शाक्य/जलसाघर

2 टिप्‍पणियां:

  1. साडी के बारे में बहुत बढ़िया जानकारी प्रस्तुति
    साडी भारतीय संस्कृति की पहचान हैं

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  2. हिन्दी सिनेमा मे साड़ी का रोचक योगदान व अदभुत सफर।

    Mrinalini Gajbe

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